संपादकीय
रांची : झारखंड में JSSC CGL परीक्षा को रद्द करने और 2014 के बाद की तमाम परीक्षाओं की व्यापक CID जांच कराने का राज्य सरकार का निर्णय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के टूटे विश्वास पर लगाई गई एक जरूरी मरहम है। रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम से लेकर सड़कों तक युवाओं का आक्रोश इस बात का प्रमाण था कि परीक्षा प्रणाली में सेंधमारी अब सहनशीलता की सीमा पार कर चुकी है। मुख्यमंत्री का यह स्वीकारना कि जांच में “चौंकाने वाले तथ्य और संगठित सिंडिकेट” सामने आए हैं, इस बात की तस्दीक करता है कि समस्या केवल एक पर्चा लीक होने की नहीं, बल्कि तंत्र में पैठ बना चुके भ्रष्टाचार की है।
पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ परीक्षाएं रद्द कर देना ही समस्या का अंतिम समाधान है?
परीक्षाएं रद्द होने से धांधली का चक्र तो रुकता है, लेकिन इसके साथ ही उन ईमानदार अभ्यर्थियों के साल-दर-साल का कठिन परिश्रम, आर्थिक संसाधन और ढलती उम्र की उम्मीदें भी स्वाहा हो जाती हैं। झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ सरकारी नौकरियां सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का मुख्य आधार हैं, वहां बार-बार परीक्षाओं का टलना या रद्द होना युवाओं में मानसिक तनाव और पलायन की प्रवृत्ति को जन्म देता है। इसलिए, अब समय केवल जांच और रद्दीकरण तक सीमित रहने का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन) करने का है।
राज्य में परीक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार को तत्काल कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:
- मजबूत कानूनी व तकनीकी ढांचा: IAS अमिताभ कौशल कमेटी के गठन और SOP सुधार की दिशा में बढ़े कदम सराहनीय हैं, लेकिन इन्हें केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहना होगा। परीक्षा के प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर प्रिंटिंग, परिवहन और परीक्षा केंद्रों के चयन तक ‘एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन’ और पारदर्शी तकनीक का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए।
- आउटसोर्सिंग एजेंसियों की सख्त स्क्रीनिंग: बार-बार विवादों में घिरने वाली निजी एजेंसियों (जैसे TDPL) पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय राज्य को अपनी स्वायत्त और मजबूत परीक्षा मशीनरी खड़ी करनी होगी। एजेंसियों के चयन में उनकी पृष्ठभूमि, गोपनीयता क्षमता और ट्रैक रिकॉर्ड की कठोरतम मानकों पर जांच हो।
- त्वरित न्याय और अनुकरणीय सजा: परीक्षा अधिनियम के तहत बने कड़े कानूनों को केवल फाइलों में बंद रखने के बजाय धांधली में शामिल भू-माफियाओं, दलालों और भ्रष्ट अधिकारियों पर फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए ऐसी सख्त सजा तय की जाए, जो नजीर बन सके।
झारखंड के युवाओं ने अपना काम निष्ठा से किया है—उन्होंने दिन-रात पढ़ाई की और अपने हक के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन किया। अब बारी सरकार और प्रशासन की है। परीक्षा रद्द करने के इस साहसिक कदम के बाद अब सरकार को समयबद्ध सीमा के भीतर पूरी तरह निष्पक्ष और लीक-प्रूफ माहौल में पुन: परीक्षाएं आयोजित कर यह साबित करना होगा कि राज्य में योग्यता और प्रतिभा के साथ कोई समझौता नहीं होगा। विश्वास की यह बहाली ही झारखंड के स्वर्णिम भविष्य की पहली शर्त है।













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