प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के नेता भले इस बात का माहौल बनाएं कि चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों में से भाजपा और उसके गठबंधन की सहयोगियों ने कमाल किया है। लेकिन हकीकत यह है कि विपक्षी पार्टियों ने चुनाव लगभग बराबर कर दिया। भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 15 सीटें जीती हैं तो उसकी विरोधी पार्टियों या निर्दलियों ने 13 सीटें जीत लीं। पहले कहा जा रहा था कि एनडीए 16 सीट जीत रहा है लेकिन अंत में बिहार की दरभंगा स्नातक सीट पर भाजपा के सर्वेश कुमार हार गए। उनको राजद के अनिल झा ने हरा दिया। सोचें, सर्वेश कुमार पिछली बार यानी 2020 में निर्दलीय लड़ कर जीत गए थे और इस बार भाजपा के साथ जाकर हार गए हैं। इस बार बिहार में भाजपा को दो सीटें मिली हैं और राजद ने भी दो सीटें हासिल कर ली हैं, जबकि पिछली बार उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। राजद का एक भूमिहार एमएलसी जीता है और एक ब्राह्मण। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी से भी भूमिहार एमएलसी जीता है और दो निर्दलीय जो जीतें हें उनमें एक राजपूत और एक अतिपिछड़ी जाति के हैं।
बहरहाल, बिहार की तरह ही उत्तर प्रदेश में वाराणसी स्नातक सीट पर दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती में समाजवादी पार्टी जीत गई। इससे पहले वाराणसी शिक्षक सीट से भी सपा जीत चुकी थी। गोरखपुर की सीट पर बड़ी मुश्किल से भाजपा 307 वोट से जीती। उसके ध्रुव त्रिपाठी मुश्किल लड़ाई में फंसे थे। निर्दलीय राजीव यादव उनको कड़ी टक्कर दी। सपा के संजयन त्रिपाठी उस सीट पर तीसरे स्थान पर चले गए। यह भी एक संकेत है कि सपा का वोट उसकी अगड़ी जाति के उम्मीदवार को नहीं ट्रांसफर हो रहा है। उनको अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि वाराणसी में उसके ब्राह्मण उम्मीदवार डॉक्टर प्रमोद मिश्रा हारे तो राजपूत उम्मीदवार केदारनाथ सिंह भी हार गए और लखनऊ में कुर्मी उम्मीदवार अवनीश सिंह पटेल भी हार गए। यूपी में भाजपा का पूरा वोट समीकरण बिगड़ गया। हालांकि वह 11 में से छह सीट जीत गई लेकिन कुल पड़े वोट में सपा को भाजपा से ज्यादा वोट मिले। कुल साढ़े 14 लाख वोटों का चुनाव था, जिसमें से भाजपा को दो लाख 61 हजार और सपा को दो लाख 64 हजार वोट मिले। यह भाजपा के लिए चिंता की बात है। सिर्फ चार महीने के बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।
ऐसे ही भाजपा के साथ महाराष्ट्र में भी हुआ, जहां वह पुणे की दोनों सीटें हार गई और नागपुर की सीट भी हार गए। वहां पांच सीटों में से विपक्ष का महाविकास अघाड़ी तीन और भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति ने दो सीटें जीतीं। सो, अगर इन तीन राज्यों में देखें तो इनकी 24 सीटों में एनडीए को 11 सीटें मिलीं और विपक्ष ने 13 सीटें जीतीं। बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा विरोधी पार्टियों को उससे ज्यादा सीटें मिली हैं। समीकरण बदल गया कर्नाटक के चुनाव से, जहां कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा ने अपनी जीती तीन सीटें बचा लीं, जबकि उसकी सहयोगी जेडीएस ने एक सीट कांग्रेस से छीन ली। अगर कांग्रेस एक सीट बचा लेती तो विपक्ष की भी 14 सीटें हो जातीं। यानी मुकाबला बराबरी पर छूटता। सो, भले एनडीए की जीत का ढिंढोरा बहुत पीटा जाए और कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और एनडीए का प्रदर्शन सिर्फ कर्नाटक में बहुत अच्छा रहा है। बाकी तीन राज्यों में उसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है।














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