आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोधों का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं।
भारत में चुनावों को नियंत्रित करने के आरोप के कई पहलू हैं, मगर उनके लिए आम बोलचाल में ‘वोट चोरी’ शब्द प्रचलित हो गया है। आज जब वोट चोरी कहा जाता है, तो निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को अपने माफिक बदलने के नरेंद्र मोदी सरकार के कदम, भारतीय जनता पार्टी की सुविधा के मुताबिक चुनाव कार्यक्रम तय होने की बनी धारणा, आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू करने में भेदभाव, मतदान के दिन प्रशासन के एकतरफा रुख, मतदाताओं की संख्या से अधिक मतदान होने की बढ़ती गई शिकायतें, वोटर लिस्ट से इरादतन नाम काटने या जोड़ने के इल्जाम, और अब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर संगीन हुए संदेह- सभी शामिल होते हैं।
वैसे अविश्वास इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर भी रहा है। यह खासकर इसलिए गंभीर हुआ, क्योंकि वीवीपैट पर्चियों की गणना करने और ईवीएम के सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग को विपक्ष के साथ साझा करने के मामलों में निर्वाचन आयोग ने जिद्दी रुख अपनाए रखा है। विपक्षी दलों से संवाद करने और उनके शक को दूर करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर आयोग ने जनमत के एक बड़े दायरे में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया को संदिग्ध बना रखा है। आज जब ‘वोट चोरी’ कहा जाता है, तो उससे गुजरे वर्षों में इन सबको लेकर गहराती गई धारणा की अभिव्यक्ति होती है।
सितंबर में जब इंडियन एक्सप्रेस ने एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग के अंदर आपत्तियों और मतभेद की खबर छापी, तब से ‘वोट चोरी’ एक बड़ा सियासी मुद्दा बनी हुई है। अक्टूबर के पहले दो हफ्तों में यह एक बड़ी राजनीतिक गोलबंदी को प्रेरित करती नजर आई। कॉकरोच जनता पार्टी और उसके साथ जुड़े, खासकर वामपंथी छात्र/युवा संगठनों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर जोर डालने के लिए आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया। कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के घटक विपक्षी दल भी कभी अलग से, और कभी युवा आंदोलन के सहायक के रूप में सक्रिय नजर आए। यह सक्रियता अभी जारी है। इसके बावजूद अब राय बनने लगी है कि ‘वोट चोरी’ आंदोलन उस तरह राजनीतिक संगठनों से बाहर के नौजवानों, और आम जन को उद्वेलित नहीं कर पाया, जैसा जून-जुलाई में नीट पेपर लीक के बाद शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के दौरान हुआ था।
यानी ‘वोट चोरी’ आंदोलन असल में राजनीतिकृत (politicalised/ politicised) युवाओं, संगठनों और दलों का आंदोलन भर बन कर रह गया है। यहां राजनीतिकृत से मतलब उन नौजवानों से है, जो किसी ना किसी राजनीतिक दल से संबंधित छात्र या युवा संगठनों का हिस्सा हैं या फिर उन लोगों से जो राजनीतिक दलों से सीधे जुड़े हुए हैं। इसके अलावा इस आंदोलन को उन लोगों का समर्थन मिला है, जो राजनीतिक रूप से जागरूक हैं और ‘वोट चोरी’ के परिणाम को समझते हैं। कुल मिलाकर आंदोलन में भागीदारी उन व्यक्तियों और समूहों तक सीमित रही है, जो देश में पहले से मौजूद राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच “मोदी विरोधी धुरी” पर मौजूद रहे हैं। जबकि इस आंदोलन की सफलता इस धुरी पर नए लोगों को लाने और नए जन समूहों तक इसके विस्तार से अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है।
अगर यह आकलन सही है, तो फिर सवाल उठेगा कि स्वतंत्र’ छात्र-युवा क्यों ‘नीट पेपर लीक आंदोलन की ओर आकर्षित हुए, जिससे उनके परिजनों का समर्थन भी उसे मिलने लगा; और क्यों ‘वोट चोरी’ विरोधी आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हुआ?
दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार के रुख को देखें, तो उससे भी ऐसे आकलन को बल मिलता है। नीट पेपर लीक आंदोलन धीरे-धीरे मोदी सरकार की बड़ी चिंता बनता जा रहा था। 20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ के दौरान आंदोलनकारियों के हुए दमन पर देश के विभिन्न इलाकों में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली और जिस तरह स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन हुए- जो कई जगहों पर उग्र होते भी नजर आए- उनसे मोदी सरकार की नींद उड़ी। इसीलिए उसने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर बढ़ते संकट को निष्प्रभावी करने में अपनी भलाई देखी। अब ज्ञानेश कुमार के मामले उसे ऐसा करने की जरूरत महसूस नहीं हुई है, तो संभवतः इसीलिए कि इस आंदोलन में उस तरह की “स्वतःस्फूर्तता” (spontaneities’) नज़र नहीं आई है।
क्यों? यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। क्या ‘वोट चोरी’ का सवाल उस तरह आम जन को नहीं छूता, जैसे पेपर लीक के मुद्दे ने छात्रों को स्पर्श किया था? हाल में एक पॉडकास्ट में राजनीति-शास्त्री अजय गुडावर्ती ने कहा कि एसआईआर में 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम काट दिए गए, लेकिन 13 करोड़ लोग कहां हैं? क्या वे सिर्फ संख्या हैं या वास्तविक नागरिक हैं, जिन्हें विपक्ष ने अपने साथ जोड़ने की कोई कोशिश नहीं की है? विपक्षी दल अगर उन 13 करोड़ लोगों में से आठ-दस फीसदी को भी गोलबंद कर पाते और उनको लेकर देश में किसी स्थल पर ‘जंतर-मंतर’ बना देते, तो क्या सरकार के लिए इस आंदोलन को नजरअंदाज कर पाना संभव होता?
गुडावर्ती का यह सवाल आंदोलन के चरित्र को समझने के लिहाज से अहम है। इसका संदेश यह है कि पेपर लीक से प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित छात्रों और उनके परिजनों की भागीदारी ने कॉकरोच आंदोलन को जानदार बनाया था, जबकि वोट चोरी आंदोलन में ऐसे प्रत्यक्ष रूप से पीड़ित पक्षों की लगभग कोई भागीदारी नहीं रही है। यह कमोबेश अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से आए, राजनीतिक रूप से जागरूक, और मोदी विरोधी राजनीतिक समूहों से जुड़े लोगों का आंदोलन बना रहा, जिस कारण फिलहाल सरकार ने उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं समझी है।
चूंकि मौजूदा सत्ताधारी सबको साथ लेकर चलने में यकीन नहीं करते, इसलिए उनकी दृष्टि अपने निकट राजनीतिक एवं अन्य स्वार्थों से आगे नहीं जाती है। देश के दीर्घकालिक भविष्य के प्रति लापरवाह हैं, नतीजतन ‘वोट चोरी’ के कथानक से जनमत के एक बड़े हिस्से की निगाह में भारतीय राजसत्ता की वैधता संदिग्ध होने और देश की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर गहराते सवाल उन्हें अहम नहीं लगते। उनकी निगाह में तब तक ये मुद्दे गौर करने लायक नहीं बनेंगे, जब तक कि उनकी वजह से उनकी सत्ता के लिए फौरी खतरा पैदा ना हो! यह साफ है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन से अब तक ऐसा नहीं हुआ है।
इसलिए इस बात की वास्तविक आशंका है कि वोट चोरी विरोधी आंदोलन उसी तरह के गतिरोध का शिकार हो जाएगा, जैसा नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अनेक आंदोलनों के साथ हुआ है। मोदी सरकार की यह एक खास पहचान रही है कि वह अपने से असहमत जन समूहों की मांगों या उनके आंदोलनों का समाधान करने की जरूरत नहीं समझती। नतीजतन, ऐसे तमाम आंदोलन गतिरोध का शिकार हो जाते हैं। मोदी सरकार ऐसे मामलों में खुद एक पक्ष बन कर आंदोलनों को देश विरोधी किसी साजिश का हिस्सा बताने की रणनीति अपना लेती है, जिससे अक्सर वह अपने समर्थक तबकों को अपने पक्ष में अधिक गोलबंद करने में सफल रहती आई है। लेकिन उससे पैदा होने वाला गतिरोध संबंधित असंतुष्ट जन समूहों में टूटन और व्यवस्था से अलगाव का बोध पैदा करता है। देश और समाज के लिए इसके दूरगामी परिणाम बेहद हानिकारक हो सकते हैं। लेकिन तथ्य यही है कि वर्तमान सत्ताधारी उसकी चिंता नहीं करते।
इसलिए ये संभावना फिलहाल कम दिखती है कि चुनाव प्रणाली और निर्वाचन आयोग की घटती साख से उत्पन्न समस्या का कोई समाधान निकलेगा। अधिक संभावना यह है कि वोट चोरी के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बढ़ता जाएगा। इससे जनमत के एक बड़े दायरे में भारतीय चुनावों की विश्वसनीयता घटेगी और उसकी निगाह में राजसत्ता की लोक-वैधता संदिग्ध होगी। विपक्ष हर चुनावी हार के बाद ‘वोट चोरी’ के इल्जाम लगाएगा, जबकि सत्ता पक्ष इसे पराजित पक्ष की हताशा की मिसाल के रूप में पेश करेगा। जैसे यह स्थिति एक बड़े जनमत की निगाह में चुनाव परिणामों को संदिग्ध बनाए रखेगी, वैसे ही जनमत के दूसरे हिस्सों की निगाह में इससे विपक्षी कथानक की साख पर सवाल उठेंगे। कहा जाएगा कि जब विपक्ष जब जीत जाता है, तो उसे चुनाव स्वच्छ मालूम पड़ते हैं, जबकि हार की स्थिति में ‘वोट चोरी’ की बात कर वह ‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’ की कहावत को चरितार्थ करता है! इस तरह यह मुद्दा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तीक्ष्ण बनाएगा।
जब तक विपक्ष इसे आर-पार की लड़ाई का मुद्दा बनाने को तैयार नहीं होता, इस गतिरोध के इसी रूप में आगे बढ़ते रहने की संभावना है। आर-पार की लड़ाई का एक रूप यही हो सकता है कि विपक्ष अपनी शर्तें तय करे और उनके पूरा होने तक चुनाव बहिष्कार का एलान करे। मसलन, यह कि एसआईआर रद्द कर जब तक उसके पहले की मतदाता सूची बहाल नहीं होती, निर्वाचन कार्यक्रम तय करने में उसकी सलाह को अहमियत नहीं दी जाती, अथवा ईवीएम संबंधित उसकी शिकायतों को दूर नहीं किया जाता, विपक्ष (यानी इंडिया गठबंधन) किसी चुनाव में भाग नहीं लेगा। कहा जा सकता है कि सिर्फ ऐसा होने पर ही वोट चोरी के कथानक को विपक्षी दायरे से बाहर विश्वसनीयता हासिल हो सकती है। संभवतः तभी ऐसी सूरत बन सकेगी, जब विपक्षी राजनीतिक दलों के दायरे से बाहर के लोग ‘वोट चोरी’ को लेकर उद्वेलित हों।
वरना, फिलहाल यह आंदोलन ‘संविधान बचाओ मुहिम’ के हश्र की तरफ जाता दिख रहा है। इस स्थिति का संदर्भ कहीं व्यापक है। गौरतलब है कि मोदी राज के 12 साल में विपक्षी दलों की पूरी सियासत नकारात्मक गोलबंदी की कोशिश पर टिकी रही है। या इसे इस तरह कहा जा सकता है कि ये दल ‘एंटी-इन्कम्बैंसी’ के भरोसे बैठे रहे हैं, जिसे पैदा करने या फैलाने के लिए उन्होंने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की रोजमर्रा के स्तर पर आलोचना पेश की है। लेकिन उन्होंने अपना कोई सकारात्मक एजेंडा आम जन के सामने नहीं रखा है। ना ही उन्होंने अपने पूर्व शासनकाल की गलतियों एवं नाकामियों की समीक्षा करने की जरूरत महसूस की है। इस कारण अक्सर उनकी आलोचनाएं अवसरवाद से ग्रस्त नज़र
आई हैं।
जमीनी स्तर तक संगठन के मामले में अपनी कमजोरी के कारण ये दल अपना संदेश (जो भी संदेश उनके पास हो) आम जन तक ले जाने में सक्षम साबित नहीं हुए हैं। प्रतिबद्ध एवं विचार-सक्षम कार्यकर्ताओं का अभाव इन दलों की समस्या बना हुआ है। भाजपा/आरएसएस की विशाल चुनावी मशीनरी की तुलना में देखें, तो यह समस्या और भी अधिक गंभीर नजर आती है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर और अति-महत्त्वपूर्ण मसले को भी ये दल जन मुद्दा नहीं बना पाए हैं। अधिक से अधिक वे इसे राजनीतिक दलों के बीच का मुद्दा बनाने में सफल हुए हैँ। नतीजा, वह गतिरोध है, जिसकी चर्चा इस लेख में ऊपर हुई है।
दोहराव का जोखिम उठाते हुए भी यह कहना अनिवार्य है कि यह गतिरोध सिर्फ किसी नाटकीय या परिदृश्य में आमूल-चूल बदलाव लाने वाले कदम से ही टूट सकता है। बेशक चुनाव बहिष्कार का निर्णय ऐसा एक कदम होगा। लेकिन उससे ऐसा फैसला करने वाले दलों के लिए दूसरे किस्म की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। भारतीय राजनीति का आज जो चरित्र है, उसमें ज्यादातर राजनीतिक दल किसी विचार या उद्देश्य के इर्द-गिर्द संगठित नहीं हैं।
ये असल में महत्त्वाकांक्षी, निहित-स्वार्थी और सत्ता की लालसा रखने वाले तत्वों की जमात भर रह गए हैं। इसलिए चुनाव ना लड़ने का एलान करने का एक मतलब यह संदेश देना होगा कि अभी लंबे समय तक सत्ता या उससे संबंधित लाभ मिलने की संभावना नहीं है। उस हाल में पार्टी के साथ कितने नेता और कथित कार्यकर्ता जुड़े रह जाएंगे, यह बड़ा सवाल है। यह संभव है कि उस स्थिति में बहुत से नेता/कथित कार्यकर्ता उस दल में चले जाएं, जिसके चुनाव में शामिल होने की संभावना होगी या फिर यह भी संभव है कि उनका एक हिस्सा चुनाव लड़ने के लिए खुद अपनी पार्टी बना ले।
पार्टियों का ढांचा ऐसा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग उनसे सिर्फ इस उम्मीद में जुड़े रहते हैं कि उन्हें कभी, किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। ऐसा ना भी हो, तो निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए कई तरह के फायदों की आस रहती है। चुनाव के समय पार्टियां चंदा और संसाधन इकट्ठा करती हैं, जिससे वे कथित कार्यकर्ता भी लाभान्वित होते हैं, जिन्हें खुद चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलता। यानी चुनाव ना सिर्फ एक राजनीतिक गतिविधि है, बल्कि इसकी अपनी एक खास अर्थव्यवस्था है, जिसके लाभ इस प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति उठाते हैं।
इसीलिए पार्टियों के लिए चुनाव बहिष्कार का फैसला करना बेहद कठिन है। चूंकि ऐसा होने की फिलहाल गुंजाइश नहीं है, इसलिए ‘वोट चोरी’ आंदोलन के आगे बढ़ने की संभावना भी सीमित है। ऐसे में छिटपुट गतिविधियों के जरिए इस आंदोलन को जारी रखने की धारणा बनाने की कोशिशें होती रहेंगी। एक नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की प्रस्तावित रैली वैसा ही एक प्रयास है। लेकिन दूरगामी प्रभाव छोड़ने के लिहाज ये गतिविधियां अप्रभावी साबित होती रहेंगी।














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