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सरकार लगी है भाषण और ब्रीफिंग में!

एक तरफ जनता के सामने हर दिन महसूस हो रहा संकट है तो दूसरी ओर सरकार की रोज की प्रेस ब्रीफिंग है। हर दिन पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय, शिपिंग मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सूचना व प्रसारण मंत्रालय आदि की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही है। इसमें बताया जा रहा है कि भारत में पेट्रोल, डीडल या गैस का कोई संकट नहीं है। सवाल है कि जब संकट नहीं है तो कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति क्यों बंद हुई थी या अब भी सिर्फ 50 फीसदी ही आपूर्ति क्यों हो रही है? यह कहने में सरकार को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि पश्चिम एशिया की जंग के कारण कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर देश में भी पड़ेगा। यह कहने की बजाय सरकार के मंत्रालय कह रहे हैं कि कोई समस्या नहीं है।

सरकार की ओर से एक विस्तृत नोट जारी किया गया है, जिसमें भारत में तेल व गैस की स्थिति की जानकारी दी गई है। बताया गया है कि भारत ने गैस का घरेलू उत्पादन 40 फीसदी बढ़ा दिया है। इसका अर्थ है कि देश में अब जरुरत की 70 फीसदी गैस उत्पादित की जा रही है और सिर्फ 30 फीसदी के लिए दूसरे देशों पर निर्भऱता है। सवाल है कि जब भारत में 70 फीसदी तक गैस उत्पादित करने की क्षमता थी तो फिर संकट से पहले तक सिर्फ 40 फीसदी ही क्यों उत्पादित किया जा रहा था? यह भी सरकार का ही आंकड़ा है। युद्ध शुरू होने से पहले भारत अपनी जरुरत का 90 फीसदी तेल आयात करता था, जबकि गैस 60 फीसदी आयात की जाती थी। यानी अपनी जरुरत का सिर्फ 10 फीसदी तेल उत्पादित होता था और 40 फीसदी गैस उत्पादित होती थी। अचानक एक महीने में भारत ने उत्पादन की क्षमता 40 से बढ़ा कर 70 फीसदी कर ली है!

सरकार की ओर से विस्तृत नोट में बताया गया है कि देश में 74 दिन के स्टोरेज क्षमता है, जिसमें 60 दिन के लिए तेल और गैस का भंडार अब भी है। यानी स्टोरेज की जितनी क्षमता है उसके 15 फीसदी के बराबर भंडार खाली है। इस पर भी बड़ा सवाल उठता है कि भारत जैसा देश, जो तेल व गैस के मामले में आयात पर ही निर्भर है और जिसकी भंडारण क्षमता इतनी कम है उसके स्टोरेज में भी 15 फीसदी जगह खाली क्यों है? भंडार को पूरा भरा होना चाहिए था! लेकिन इसके अलावा सरकार की ओर से जारी सफाई में दिलचस्प यह है कि 60 दिन के जिस स्टॉक की बात कही जा रही है उसमें कच्चा तेल भी है, रिफाइन किया गया तेल भी है और स्ट्रेटजिक रिजर्व का भी तेल है। सोचें, सामरिक रिजर्व का मतलब है कि युद्ध की स्थिति बने तो उस समय जो जरुरत होगी और खास कर सेना के मूवमेंट और उसके इस्तेमाल के लिए जरुरत होगी वह भी इसी 60 दिन के भंडार में है। क्या इसे मौजूदा संकट के समय निकाला जा सकता है? अगर पहाड़ की गुफाओं या जमीन के अंदर रखे गए सामरिक रिजर्व को हटा दें तो भारत के पास कितने दिन का रिजर्व है? यह बड़ा सवाल है। सरकार कह रही है कि उसने अगले दो महीने की जरुरत के तेल की खरीद का ऑर्डर कर दिया है। लेकिन इससे लोगों का भरोसा नहीं बन रहा है।

इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने तय किया कि वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक करेंगे। इससे पहले उन्होंने संसद के दोनों सदनों में अलग अलग दिन बयान दिए। उसका लब्बोलुआब यह था कि संकट बढ़ने वाला है, देश के लिए परीक्षा की घड़ी है और सभी राज्यों के टीम इंडिया की तरह काम करना होगा। सोचें, प्रधानमंत्री को संकट के समय राज्य याद आते हैं और टीम इंडिया की तरह काम करने की बात याद आती है। लेकिन सामान्य दिनों में हर विपक्षी शासन वाले राज्य के मुख्यमंत्री पर निजी हमले होते रहते हैं। सबको भ्रष्ट बताया जाता है। राज्य सरकारों को पार्टियों का एटीएम बताया जाता है। उनको देशद्रोही करार दिया जाता है तो कहीं हिंदू विरोधी बताया जाता है। यह रोज का काम है। क्या अच्छा यह नहीं होता कि सभी राज्यों को हमेशा टीम इंडिया की तरह देखा जाए?

बहरहाल, राज्यों के साथ होने वाली बैठक से पहले केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में 10 रुपए की कमी कर दी। पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 13 से घटा कर तीन रुपए और डीजल पर उत्पाद शुल्क 10 रुपए से घटा कर शून्य कर दिया गया। हालांकि इसका लाभ आम जनता को नहीं मिलेगा। आम जनता को यह लाभ होगा कि कीमत नहीं बढ़ेगी। सरकार जो उत्पाद शुल्क घटाएगी वह पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनियों को हो रहे घाटे की भरपाई के लिए जाएगी। ध्यान रहे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बहुत बढ़ गई है। पहले तो तेल कंपनियों ने अपने यहां रिस्ट्रक्चरिंग की और रिफाइनरी व मार्केटिंग के बीच घाटे का बराबर बंटवारा किया। लेकिन जब मुश्किल बढ़ गई तो सरकार को दखल देना पड़ा।

मुश्किल यह है कि राज्यों के सामने पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाए जाने वाले टैक्स के अलावा राजस्व के ज्यादा साधन नहीं हैं। इसके अलावा सिर्फ शराब का टैक्स है। बाकी जो सब जीएसटी में है। इसलिए राज्य सरकार अपने यहां टैक्स में कटौती करने से हिचकेंगे क्योंकि इससे उनका राजस्व घटेगा। राज्य सरकारें यह अफोर्ड नहीं कर सकती हैं क्योंकि सबने मुफ्त की योजनाओं के कारण खर्च बढ़ा रखा है। दूसरी बात यह है कि पेट्रोलियम उत्पादों का मामला पूरी तरह से केंद्र सरकार का है। इसमें प्रधानमंत्री ज्यादा से ज्यादा आपूर्ति सुनिश्चित करने और कालाबाजारी या जमाखोरी रोकने के लिए कह सकते हैं। राज्य सरकारें अपनी ओर से पेट्रोल और डीजल या गैस के इंतजाम नहीं कर सकती हैं।

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