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कांशीराम पर राहुल का बेमतलब बयान

लोग अक्सर पूछते हैं कि राहुल गांधी का भाषण कौन लिखता है? जवाब भी लोग खुद ही देते हैं कि उनके पास हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड से पढ़े हुए लोग हैं, जो भाषण लिखते हैं। लेकिन भाषण तो प्रधानमंत्री से लेकर दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रादेशिक पार्टियों के नेताओं का भी कोई न कोई लिखता है। इसका यह मतलब नहीं होता है कि नेता जो लिख कर दिया जाएगा वह पढ़ देगा। राहुल गांधी बहुत साहसी हैं, निर्भीक हैं, ईमानदार हैं, अकेले हैं जो सरकार के खिलाफ झुके नहीं आदि आदि बातें बिल्कुल सही हैं। लेकिन क्या यह चुनाव जीत जाने का कोई पैमाना है? अगर यह चुनाव जीतने का पैमाना होता तो हर जगह कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकार होती। उनके नेता भी साहसी हैं, भाजपा का विरोध करते हैं और खुल कर अपनी बात करते हैं। इसलिए यह एक मूल्य है लेकिन चुनाव जीतने के लिए जो राजनीतिक समझ और जिस स्तर की मेहनत करने की जरुरत होती है उसका दशांश भी राहुल नहीं करते हैं।

अब लखनऊ में बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती के मौके पर आयोजित संविधान सम्मान कार्यक्रम में उन्होंने जो कहा वह इसकी मिसाल है। राहुल गांधी ने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बनते। सोचें, इस बयान का क्या मतलब है? किसी ने उनको लिख कर दिया और उन्होंने बिना कांशीराम को जाने यह बयान दे दिया! यह बहुजन राजनीति को नया स्वरूप देने वाले कांशीराम के प्रति बेहद अपमानजनक बयान था। क्योंकि अगर कांशीराम को मुख्यमंत्री बनना होता तो वे खुद ही बन जाते इसके लिए उनको जवाहरलाल नेहरू या कांग्रेस पार्टी की जरुरत नहीं थी। उन्होंने अपने प्रयास से तीन बार मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। आखिरी बार मायावती जब 2007 में सीएम बनीं तब तक कांशीराम का स्वास्थ्य खराब हो गया था। लेकिन उससे पहले तीन बार उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री बनाया। वे चाहते तो खुद भी मुख्यमंत्री बन सकते थे। ऐसे में राहुल गांधी का यह कहना कि नेहरू होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बन जाते यह कांग्रेस का नुकसान करने वाला बयान है।

अब सवाल है कि राहुल गांधी ने इस तरह का बयान क्यों दिया? असल में उनको समझाया गया है कि नेहरू के जमाने की कांग्रेस की बात करनी चाहिए क्योंकि इससे दलित, मुस्लिम साथ आएंगे और ब्राह्मण भी आ जाएंगे। यानी कांग्रेस का पुराना सामाजिक समीकरण बन जाएगा। लेकिन यह समझाने वालों ने उनको यह नहीं बताया कि अब यह समीकरण काम नहीं करता है। उलटे इस समीकरण की बात से नुकसान होगा क्योंकि यूपी के दलित और बसपा समर्थक पूछ रहे हैं कि नेहरू जी ने कितने दलितों को मुख्यमंत्री बनाया था? संभवतः आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया था और नेहरू के जमाने में वे इकलौते दलित सीएम रहे। कांग्रेस के आखिरी दलित सीएम पंजाब के चरणजीत सिंह चन्नी थे। कांग्रेस ने सैकड़ों सीएम बनाए लेकिन उनमें से कुल चार या पांच दलित सीएम थे। भारतीय जनता पार्टी ने तो अभी तक खैर किसी दलित को सीएम नहीं बनाया है। सोचें, नेहरू 17 साल देश के प्रधानमंत्री रहे और सिर्फ एक दलित मुख्यमंत्री बनाया और आज राहुल गांधी कह रहे हैं कि नेहरू होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बन जाते! उनको बेसिरपैर की बातों से बचने की भरसक कोशिश करनी चाहिए क्योंकि इससे उनकी छवि एक अगंभीर नेता की बनती है।

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