बिना मुआवजे और विधिवत अधिग्रहण के निर्माण शुरू कराने का ग्रामीणों ने लगाया आरोप; इलाके में निषेधाज्ञा के बावजूद भड़की हिंसा
मेदिनीनगर (पलामू) जिले के सदर थाना क्षेत्र अंतर्गत चियांकी इलाके में राष्ट्रीय राजमार्ग (फोरलेन) निर्माण परियोजना को लेकर चल रहा गतिरोध गुरुवार को खूनी संघर्ष में तब्दील हो गया। जमीन अधिग्रहण और उचित मुआवजे की मांग को लेकर हफ्तों से सुलग रहा ग्रामीणों का आक्रोश अचानक फूट पड़ा और पूरा इलाका रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। आक्रोशित ग्रामीणों ने मौके पर मौजूद पुलिस और प्रशासनिक टीम को निशाना बनाते हुए भारी पथराव कर दिया।
इस हिंसक झड़प में ड्यूटी पर तैनात झारखंड सशस्त्र पुलिस (जैप) के जवान राजमोहन सिंह और सहायक पुलिस की महिला जवान प्रिया सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों घायल जवानों को आनन-फानन में इलाज के लिए मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (MMCH) में भर्ती कराया गया है, जहाँ उनका उपचार चल रहा है।
हाईवे जाम, भारी संख्या में पुलिस बल तैनात
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। डीएसपी राजेश यादव सहित कई वरीय प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अतिरिक्त बल के साथ मौके पर पहुंचे और मोर्चा संभाला। पथराव के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया, जिससे वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। हालांकि, बाद में अधिकारियों की सूझबूझ और ग्रामीणों के साथ हुई वार्ता के बाद जाम को हटवाया जा सका। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए फिलहाल चियांकी में भारी संख्या में पुलिस बल कैंप कर रहा है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
चियांकी अब नगर निगम क्षेत्र के तहत आता है, जहाँ से फोरलेन सड़क का निर्माण प्रस्तावित है। प्रभावित ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि प्रशासन और निर्माण एजेंसी तानाशाही रवैया अपना रही है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी कीमती जमीन का न तो अब तक विधिवत अधिग्रहण पूरा किया गया है और न ही उन्हें बाजार दर पर उचित मुआवजा मिला है। इसके बावजूद प्रशासन के बल पर निर्माण कार्य शुरू कराने की कोशिश की जा रही है, जिसका वे विरोध कर रहे हैं।
दूसरी ओर, प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि गुरुवार को टीम भूमि अधिग्रहण से जुड़ी जरूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए मौके पर गई थी, लेकिन मुआवजे की मांग को लेकर अड़े लोगों ने अचानक कानून अपने हाथ में ले लिया।
प्रशासन ने लागू की थी निषेधाज्ञा, फिर भी भड़की चिंगारी
चियांकी में जमीन को लेकर चल रहा तनाव नया नहीं है। प्रशासन को पहले से ही यहां विरोध की आशंका थी। यही कारण है कि सदर एसडीएम संजय पांडेय ने एहतियात के तौर पर चियांकी क्षेत्र में 9 और 10 जुलाई के लिए निषेधाज्ञा (धारा 144/कर्फ्यू सदृश प्रतिबंध) लागू कर रखी थी। इसके तहत लोगों के जुटने पर पाबंदी थी, लेकिन यह प्रशासनिक तैयारी भी फेल साबित हुई और गुरुवार को तनाव ने हिंसक रूप ले लिया।
सदर थाना प्रभारी अफजल अंसारी ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा, “पथराव में हमारे दो जवान घायल हुए हैं। कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और सरकारी कार्य में बाधा डालने वाले उपद्रवियों को चिन्हित किया जा रहा है। मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”
विकास बनाम अधिकार की जंग
शहरी विस्तार ने बढ़ाई जमीन की कीमत
चियांकी के नगर निगम क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ की जमीनों का बाजार मूल्य ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा है। यही वजह है कि यह इलाका बेहद संवेदनशील बन चुका है। ग्रामीण अपनी पुश्तैनी और कीमती जमीन के बदले पारदर्शी तरीके से उचित मूल्य और कानूनी प्रक्रिया के पालन की मांग कर रहे हैं।
संवाद की कमी और उठते गंभीर सवाल
फोरलेन जैसी बुनियादी ढांचागत परियोजनाएं निश्चित रूप से क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन यह विकास संवैधानिक और स्थापित भूमि अधिग्रहण कानूनों के दायरे में ही होना चाहिए। चियांकी की इस घटना ने प्रशासन और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या सभी प्रभावित भू-स्वामियों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत मुआवजा राशि का भुगतान किया जा चुका है?
- यदि मुआवजा प्रक्रिया अधूरी है, तो निषेधाज्ञा लागू कर निर्माण कार्य शुरू करने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?
- क्या मुआवजा निर्धारण वर्तमान बाजार मूल्य के अनुरूप किया गया है?
- प्रशासन और रैयतों (जमीन मालिकों) के बीच संवादहीनता को दूर करने के लिए ठोस प्रयास क्यों नहीं किए गए?
विकास की रफ्तार तभी टिकाऊ हो सकती है जब उसमें जनता का विश्वास शामिल हो। हालांकि, अपनी मांगों के लिए पुलिस पर पथराव और हिंसा करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। फिलहाल प्रशासन स्थिति को पूरी तरह सामान्य करने और ग्रामीणों के साथ बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण समाधान निकालने के प्रयास में जुटा है।













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