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पीएम, सीएम को हटाने वाला बिल आएगा!

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल प्रकरण का दोहराव रोकने के नाम पर तैयार किए गए विधेयक को केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र में पेश कर सकती है। यह संविधान क 130वां संशोधन विधेयक है, जिसमें प्रावधान किया गया है कि अगर प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री या कोई मंत्री गिरफ्तार होता है और लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है तो 31वें दिन वह अपने आप पद से हट जाएगा। उसे इस्तीफा देने की जरुरत नहीं होगी।

गौरतलब है कि दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शराब नीति घोटाले में गिरफ्तार हुए थे और पांच महीने से ज्यादा समय तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे थे। परंतु उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया था। इससे पहले यह परंपरा रही है कि अगर किसी मुख्यमंत्री या मंत्री के गिरफ्तार होने की संभावना होती थी तो वह इस्तीफा देता था या गिरफ्तार होने पर इस्तीफा देता था। बिहार में लालू प्रसाद से लेकर तमिलनाडु में जयललिता और झारखंड में हेमंत सोरेन तक की मिसाल है। लेकिन चूंकि कोई कानून नहीं था इसलिए केजरीवाल जेल में रह कर भी मुख्यमंत्री बने रहे।

उसके बाद ही सरकार ने 130वां संशोधन विधेयक पेश किया, जिसमें प्रावधान किया गया कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य सरकार का मंत्री किसी गंभीर अपराध के मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो अपने आप पद छोड़ना पड़ सकता है। इस विधेयक का विपक्ष ने विरोध किया था तभी इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी को भेज दिया गया था।

बताया जा रहा है कि जेपीसी 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को मंजूरी दे सकती है। इसके बाद सरकार मानसून सत्र में इसे पेश कर सकती है। यह भी बताया जा रहा है कि सारे विवादित प्रावधान पहले जैसे ही रखे जाएंगे। परंतु, रिपोर्ट में कुछ सुरक्षा उपाय जोड़े जा सकते हैं, ताकि राजनीतिक बदले की भावना से झूठे मामलों में गिरफ्तारी कर किसी सरकार को अस्थिर करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग नहीं किया जा सके।

विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक यह कानून उन गंभीर मामलों में लागू होगा, जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा सजा का प्रावधान है। गृह मंत्री अमित शाह ने इससे जुड़े तीन विधेयकों को पिछले मानसून सत्र में संसद के दोनों सदनों में रखा था। जिसके बाद इसे जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया गया था। अब 17 जुलाई को इसकी रिपोर्ट आ सकती है बताया जा रहा है कि 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में इसे पेश किया जा सकता है।

विपक्षी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। विपक्ष का कहना है कि ये विधेयक अलोकतांत्रिक, संघवाद की भावना की विरोधी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरूद्ध है, क्योंकि ये सजा मिलने से पहले केवल हिरासत के आधार पर कार्रवाई करता है। गौरतलब है कि संयुक्त संसदीय समिति में शामिल विपक्षी नेता जेपीसी की इस रिपोर्ट पर अपनी असहमति दर्ज करा सकते हैं।

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