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डीएमके से और दूर हो रही है कांग्रेस

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी अपनी दशकों पुरानी सहयोगी डीएमके से दूरी बढ़ाती जा रही है। पहले तो चुनाव समाप्त होते ही उसने डीएमके से संबंध समाप्त किया और टीवीके को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया। टीवीके प्रमुख विजय ने कांग्रेस को सरकार में शामिल किया और इस तरह तमिलनाडु में कांग्रेस का 60 साल का सत्ता का सूखा समाप्त हुआ। इसके बाद डीएमके ने कांग्रेस से संबंध विच्छेद करने का ऐलान करते हुए लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखी और लोकसभा में अलग बैठने की जगह मांगी। हालांकि इसके बावजूद कई लोगों को उम्मीद थी कि अगले कुछ दिन में डीएमके और कांग्रेस फिर साथ होंगे।

हाल के घटनाक्रम से ऐसा नहीं लग रहा है। कांग्रेस ने एक तरह से डीएमके और उसके प्रमुख एमके स्टालिन को चिढ़ाते हुए अपने सांसद मणिक्कम टैगोर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। मणिक्कम टैगोर और स्टालिन का मामला वैसा ही है, जैसा बंगाल में ममता बनर्जी और अधीर रंजन चौधरी का है। विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे से पहले स्टालिन चाहते थे कि राहुल अपने नजदीकी मणिक्कम टैगोर को चुप कराएं और वार्ता से दूर रखें। टैगोर पहले से चाहते थे कि विजय के साथ तालमेल हो। उनको अध्यक्ष बना कर कांग्रेस ने निकट भविष्य में डीएमके से संबंध सुधार की संभावना को समाप्त कर दिया है।

असल में ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने भांप लिया है कि दक्षिण भारत में उसका समय आ रहा है। दक्षिण के पांच बड़े राज्यों में से तीन में उसका मुख्यमंत्री बन गया है। चौथा राज्य तमिलनाडु हो सकता है। क्योंकि कांग्रेस को लग रहा है कि वहां द्रविड राजनीति समाप्त हो रही है और डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों हाशिए में जाएंगे। नई ताकतें उभरेंगी। विजय के अलावा अन्नामलाई भी मजबूत होंगे। ऐसे में कांग्रेस भी अपनी जगह नए सिरे से बना सकती है।

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