मेदिनीनगर : पलामू जिले के नीलांबर पितांबरपुर (लेस्लीगंज ) ढेला रोड स्थित ‘आशीर्वाद हॉस्पिटल’ एक बार फिर घोर लापरवाही और विवादों के घेरे में है। अस्पताल संचालक व कथित झोला छाप डॉक्टर विकास कुमार कुशवाहा की लापरवाही के कारण प्रसव के दौरान एक नवजात शिशु की असमय मौत हो गई है। इस घटना के बाद परिजनों का आक्रोश फूट पड़ा है और अस्पताल के प्रबंधन व प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लग गए हैं।
कमीशन के खेल में गई मासूम की जान
मृत नवजात की मां प्रिया कुमारी, जो बरवाडीह थाना क्षेत्र के ग्राम पोखरी की निवासी हैं, उनके पति संजीत राम ने बताया कि उन्हें बेहतर इलाज का झांसा दिया गया था। आरोप है कि चौखड़ा की स्वास्थ्य सहिया अंजू देवी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) नीलांबर-पीतांबरपुर से बेहतर इलाज का भरोसा दिलाकर कमीशन के लालच में उन्हें इस निजी अस्पताल ले गई थीं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में न तो पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं थीं और न ही कोई योग्य चिकित्सक मौजूद था, जिसके चलते नवजात की जान चली गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अस्पताल पूर्व में भी कई नवजात शिशुओं और महिलाओं की जान ले चुका है।
जांच में खुली धांधली की पोल
घटना की सूचना मिलते ही शुक्रवार सुबह सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव, नीलांबर-पीतांबरपुर के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. राजीव रंजन और लेस्लीगंज थाना के एसआई विक्रम शील ने अस्पताल पहुंचकर जांच की। जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
- अस्पताल का निबंधन डॉ. अभिजीत आनंद के नाम पर है, जबकि वे वर्तमान में चतरा में कार्यरत हैं।
- ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक के रूप में डॉ. जन्मेजय का नाम बताया गया, लेकिन मौके पर कोई भी चिकित्सक मौजूद नहीं मिला।
- जांच के समय केवल अस्पताल संचालक विकास कुमार कुशवाहा ही उपस्थित पाया गया।
सील होने के बावजूद ‘न्यू’ नाम से चल रहा था अस्पताल
सबसे गंभीर बात यह सामने आई है कि पूर्व में सील किए गए आशीर्वाद हॉस्पिटल को “न्यू आशीर्वाद हॉस्पिटल” के नाम से नया निबंधन लेकर पुनः संचालित किया जा रहा था। एक ही बिल्डिंग और एक ही संचालक होने के बावजूद अस्पताल का नाम बदलकर व्यवस्था वही बनाए रखने का खेल प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा था।
अस्पताल पुनः सील, दोषियों पर कार्रवाई का आश्वासन
प्राथमिक जांच के उपरांत अंचलाधिकारी जागो महतो, सीएचसी प्रभारी डॉ. राजीव रंजन और पुलिस प्रशासन की टीम ने संयुक्त रूप से अस्पताल को फिर से सील कर दिया है। पीड़ित महिला को बेहतर इलाज के लिए सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों ने पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस जानलेवा लापरवाही की जिम्मेदारी किसकी है और बार-बार सील होने के बाद भी अस्पताल को दोबारा संचालित करने की अनुमति कैसे मिली?













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