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लोकतंत्र पर प्रश्न-चिह्न – Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

बंधुआ मजदूरी उन्मूलन कानून कहां है? या ऐसे कानूनों का कोई मतलब नहीं होता, जिन पर अमल संभव बनाने के लिए जमीनी स्थितियों को बदलने की ठोस योजना पर काम ना हुआ हो?

छिहत्तर साल पहले लागू भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत गुलामी जैसी किसी प्रथा को निषिद्ध घोषित किया गया। मगर बंधुआ मजदूरी को कानूनन प्रतिबंधित करने में 26 साल और लगे। 1976 में बंधुआ मजदूरी पर रोक का कानून पारित हुआ। अब उसके बाद 50 साल और गुजर चुके हैं। लेकिन जमीनी हकीकत उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर जिले का मांडी गांव है, जहां दोना बनाने वाली फैक्टरी से 12 बंधुआ मज़दूर छुड़ाए गए हैं। वैसे मांडी गांव भी सिर्फ एक झांकी है। बंधुआ और बाल बंधुआ मजदूरों से काम लेने या कभी-कभार उन्हें छुड़ाने की खबरें अक्सर हमारे सामने आती रहती हैं।

मांडी की घटना बहुचर्चित हुई, तो इसलिए कि वहां मजदूरों से बर्बरता की इंतहा कर दी गई। उनकी दुर्दशा की कहानियों ने लोगों को झकझोरा है। पुलिस और उत्तर प्रदेश के श्रम विभाग की संयुक्त कार्रवाई में छुड़ाए गए इन श्रमिकों के बारे में सामने आया है कि उन्हें क़ैदियों की तरह रखा गया, मोबाइल छीन लिए गए, पहचान-पत्र जला दिए गए और बाहर निकलने की मनाही कर दी गई। मुजफ्फरनगर के पुलिस अधीक्षक के मुताबिक कुछ मज़दूरों की पसलियां टूट गईं, कई के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान हैं और आरोप है कि अत्याचार के चलते कुछ लोगों की मौत भी हुई। यह बात पुलिस ने कही है कि फैक्टरी में मजदूरों से जानवरों जैसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जाता था।

उन्हें लोहे की गर्म रॉड, बेल्ट और डंडों से बुरी तरह पीटा जाता था। ये मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों से वहां काम की तलाश में वहां आए थे। तो प्रश्न है कि संवैधानिक उद्घोषणा और बंधुआ मजदूरी उन्मूलन कानून कहां हैं? या ऐसे कानूनों का कोई मतलब नहीं होता, जिन पर अमल संभव बनाने के लिए जमीनी स्थितियों को बदलने की किसी ठोस योजना पर काम ना हुआ हो? विचारणीय मुद्दा है कि अलग- अलग राज्यों से पलायन कर बंधुआ बनने के लिए किसी दूसरी जगह पर मजदूर क्यों आते हैं? दरअसल, ऐसी हर कहानी आजीविका की बदहाल सूरत का सबूत है, जो अपने लोकतंत्र पर एक गंभीर प्रश्न-चिह्न भी है।

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