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रिश्तों की खामोशी, अवसाद की चीख

हमें फिर से ठहरनासीखना होगा। बिना मोबाइल के, बिना किसी एजेंडा के। हमें फिर से पूछना होगा, “कैसे हो?” …रिश्ते समय मांगते हैं, उपस्थिति मांगते हैं, और सबसे बढ़ कर। साथ मांगते हैं। समय भी। यदि हम यह नहीं कर पाए, तो आने वाले समय में अवसाद केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं रहेगा, बल्कि एक सामाजिक महामारी बन जाएगा। जहां लोग बाहर से सामान्य दिखेंगे, पर भीतर से टूटे हुए होंगे।

हम एक विचित्र समय में जी रहे हैं, जहां सूचना का शोर बढ़ता जा रहा है। पर संवाद का सन्नाटा गहराता जा रहा है। मनुष्य, जो मूलतः एक सामाजिक प्राणी है, अब अपने ही बनाए वर्चुअल संसार में कैद होता जा रहा है। यह कैद दिखती नहीं, पर भीतर से लगातार तोड़ती रहती है। साथ-संगत खत्म हो रही है। यह केवल एक भावुक वाक्य नहीं, बल्कि हमारे समय की सामाजिक सच्चाई है। पहले जीवन ‘मिलने’ से चलता था। अब ‘दिखने’ से चल रहा है। दोस्ती अब बैठकों में नहीं, स्टोरीज़ में दर्ज होती है। परिवार अब साथ बैठकर नहीं, एक-दूसरे की पोस्ट लाइक करके जुड़ा रहता है। संवाद, जो रिश्तों का प्राण था, अब सूचना के आदान-प्रदान में सिमट गया है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम सचमुच ‘जुड़े’ हुए हैं? या केवल ‘जुड़े होने’ का भ्रम पाल रहे हैं? लखनऊ का ‘विक्रमादित्य मार्ग’ हो या दिल्ली का कोई मोहल्ला (रिश्तेदार, भाई-पट्टीदार, पड़ोसी) सब भौगोलिक रूप से पास हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से दूर। महीनों तक कोई हालचाल नहीं। यह दूरी केवल व्यस्तता की नहीं है, बल्कि प्राथमिकताओं की है। हमें सुदूर ‘होर्मुज स्ट्रेट’ की खबर है। वैश्विक राजनीति की समझ है। पर अपने घर के भीतर चल रहे मौन संघर्षों का ज्ञान नहीं। यह चयनित संवेदनशीलता हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। आज ‘स्पेस’ के नाम पर हमने दूरी को वैधता दे दी है। हर व्यक्ति अपने ‘इको चेम्बर’ में कैद है, जहां केवल वही विचार, वही भाव, वही छवियां हैं जो उसे सहज लगती हैं। असहमति, असुविधा, और असली संवाद से बचने की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे हमें आत्मकेंद्रित और संवेदनहीन बना रही है। पर, इसका कारण क्या है?

जानकार बताते हैं। इसका सीधा संबंध मानसिक स्वास्थ्य से है। मानसिक स्वास्थ्य का वैश्विक संकट आज चरम पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 रिपोर्ट बताती है कि एक अरब से अधिक लोग मानसिक विकारों से जूझ रहे हैं। वैश्विक आबादी का लगभग 12 से 14 प्रतिशत! इनमें चिंता और अवसाद प्रमुख हैं, जो महिलाओं को अधिक प्रभावित करते हैं। युवाओं में आधी समस्याएं 18 वर्ष से पूर्व ही शुरू हो जाती हैं। युवाओं के लिए स्थिति भयावह है। आत्महत्या 15 से 29 आयु वर्ग में प्रमुख मृत्यु कारणों में शुमार है, जो वैश्विक स्तर पर सालाना सात लाख से अधिक मौतों का कारण है। फिर भी, अधिकांश प्रभावित व्यक्ति इलाज से वंचित रहते हैं। खासकर निम्न, मध्यम आय वाले देशों में 75 प्रतिशत से अधिक। भारत इस महासंकट से अछूता नहीं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार, 10.6 प्रतिशत वयस्क (लगभग 14-15 करोड़) मानसिक विकारों से पीड़ित हैं, जिनमें 70 से 92 प्रतिशत बिना इलाज के जी रहे हैं। एनसीआरबी की 2023 रिपोर्ट में 1.71 लाख आत्महत्या के मामले दर्ज हुए, जिसमें दर एक लाख पर 12.3 व्यक्ति की रही। परिवारिक समस्याएं, बीमारी और मानसिक तनाव प्रमुख कारण।

याद रखिए यह संकट जैविक (आनुवंशिक, रासायनिक असंतुलन), मनोवैज्ञानिक (तनाव, आघात) और सामाजिक कारकों (अकेलापन, डिजिटल लत, कोविड प्रभाव, रिश्तों का क्षरण) से उपजा है। डिजिटल युग में पारिवारिक दूरी और सोशल मीडिया की लत ने इसे और गहरा दिया है।

भारत जैसे समाज, जो पारिवारिक और सामुदायिक संरचनाओं पर आधारित रहा है, वहां यह संकट और भी जटिल है। क्योंकि यहां समस्या केवल व्यक्ति की नहीं, तंत्र की है। रिश्तों के क्षरण की है।

प्रतीक यादव जैसे उदाहरण केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं; वे सामाजिक संकेत हैं। जब कोई व्यक्ति अवसाद में जाता है, तो यह केवल उसकी आंतरिक कमजोरी नहीं होती, बल्कि उसके आसपास के सामाजिक ताने-बाने की भी विफलता होती है। हम यह पूछने से बचते हैं कि क्या हमने कभी समय निकालकर सचमुच किसी का हाल पूछा? क्या हमने कभी बिना किसी स्वार्थ के किसी के साथ बैठकर केवल ‘सुना’?

आज ‘रील’ ने ‘रियल’ को विस्थापित कर दिया है। हम क्षणों को जीने के बजाय उन्हें रिकॉर्ड करने में अधिक रुचि रखते हैं। अनुभव की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। रिश्ते अब ‘कंटेंट’ बन गए हैं। और इस प्रक्रिया में उनका सत्व खो गया है।

यहां समाज को आत्मनिरीक्षण करना होगा। हमें यह समझना होगा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल दवाइयों या परामर्श का विषय नहीं है; यह सामाजिक संरचना का भी प्रश्न है। यदि संवाद समाप्त हो रहा है, तो अवसाद बढ़ेगा ही। यदि रिश्ते सतही हो रहे हैं, तो अकेलापन गहराएगा ही। समाधान बहुत जटिल नहीं हैं, पर वे आसान भी नहीं हैं। क्योंकि वे हमारी आदतों में बदलाव की मांग करते हैं।

हमें फिर से ‘ठहरना’ सीखना होगा। बिना मोबाइल के, बिना किसी एजेंडा के। हमें फिर से पूछना होगा, “कैसे हो?” और उत्तर सुनने का धैर्य भी रखना होगा। हमें अपने इको चेम्बर से बाहर निकलकर असली दुनिया की असुविधाजनक, पर जीवन्त सच्चाइयों का सामना करना होगा।

रिश्ते समय मांगते हैं, उपस्थिति मांगते हैं, और सबसे बढ़ कर। साथ मांगते हैं। समय भी। यदि हम यह नहीं कर पाए, तो आने वाले समय में अवसाद केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं रहेगा, बल्कि एक सामाजिक महामारी बन जाएगा। जहां लोग बाहर से सामान्य दिखेंगे, पर भीतर से टूटे हुए होंगे।

याद रखिए यह महामारी यह रिश्तों के क्षरण और मानवीय संवेदना का संकट है। समय है कि हम स्टिग्मा तोड़ें, बजट बढ़ाएं और समुदाय-आधारित देखभाल को अपनाएं। वरना यह चुपचाप लाखों जिंदगियां निगलता रहेगा। यह समय है, अपने भीतर झांकने का, अपने आसपास देखने का, और अपने लोगों तक लौटने का। क्योंकि अंततः, मनुष्य को मनुष्य ही बचा सकता है।(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के राम लाल आनंद कॉलेज में सहायक आचार्य हैं।)

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