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पेपर लीक सिर्फ एक संस्था की अक्षमता नहीं है

तीन साल में दूसरी बार मेडिकल में दाखिले के लिए हुई नीट यूजी की परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हो गए। इसके बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी। करीब 23 लाख किशोर और युवा उम्र के छात्रों को इससे जो सदमा लगा है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन पेपर लीक होने और परीक्षा रद्द होने के बाद सबके निशाने पर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए है, जिसके ऊपर परीक्षा कराने की जिम्मेदारी थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक अक्षम संस्था है और गठन के समय से ही इसका कामकाज संतोषप्रद नहीं रहा है।

2024 में भी नीट यूजी के पेपर लीक हुए थे। उस समय पेपर लीक होने के साथ साथ अन्य किस्म की गड़बड़ियों की खबरें भी आई थीं, जिसमें एक गड़बड़ी सेंटर मैनेज करने से जुड़ी थी। सोचें, देश के अलग अलग राज्यों के छात्रों ने गुजरात के गोधरा में एक खास परीक्षा सेंटर चुना था। नतीजों के बाद पता चला था कि कैसे एक एक सेंटर से अनुपात से ज्यादा छाच्रों को सौ फीसदी अंक मिले थे। हालांकि तब पूरी परीक्षा रद्द नहीं की गई थी। कुछ सेंटर्स पर दोबारा परीक्षा हुआ। वह भी छात्रों के लिए सदमे की तरह था।

परंतु इस बार तो पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी क्योंकि इस बार पेपर लीक होने का स्केल ज्यादा बड़ा हो गया था। व्हाट्सऐप के जरिए हजारों, लाखों लोगों तक एक क्वेश्चन बैंक पहुंचा था। तीन सौ प्रश्नों वाले इस क्वेश्चन बैंक में से डेढ़ सौ सवाल हूबहू परीक्षा में आ गए। इसके बाद मजबूरी हो गई परीक्षा रद्द करने की। 2024 और 2026 की नीट यूजी की परीक्षा में गड़बड़ी पकड़ी गई तभी सवाल है कि क्या 2025 की परीक्षा बिना गड़बड़ी वाली थी या उस समय गड़बड़ी का पता नहीं चला सका?

यह सवाल इसलिए है क्योंकि एनटीए द्वारा आय़ोजित की जाने वाली ज्यादातर परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है। पिछले साल नीट पीजी की परीक्षा में भी गड़बड़ी हुई थी और नेट पीजी की परीक्षा में भी गड़बड़ी की खबरें आई थीं। सीयूईटी की परीक्षा के के नतीजों में देरी के बाद भी सवाल उठे थे।

सोचें, 2024 की गड़बड़ी के बाद सरकार सख्त हुई तो इसरो के चेयरमैन रहे राधाकृष्णन के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया गया था। उस कमेटी की रिपोर्ट आ गई है और धूल फांक रही है। उसने कई सुझाव दिए थे, जिन पर अमल के बारे में अभी विचार नहीं हुआ है। एक सुझाव यह था कि पेन और पेपर की बजाय नीट की परीक्षा भी उसी तरह कंप्यूटर बेस्ड हो, जैसे इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए जेईई की परीक्षा होती है। नीट के मुकाबले जेईई की परीक्षा में पेपर लीक की घटनाएं कम होती हैं और चूंकि वह परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड होती है तो माना जाता है कि नीट यूजी की परीक्षा भी वैसे ही हो तो इसमें भी कम गड़बड़ियां होंगी।

लेकिन ऐसा नहीं है और ऐसा नहीं होने के कई कारण हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है, जिसे परोक्ष रूप में एनटीए और नीट यूजी वाले भी मानते हैं कि जेईई मेन्स की परीक्षा बहुत ‘हाई स्टेक एक्जाम’ नहीं होता है। जेईई मेन्स पास करने के बाद आईआईटी में दाखिला लेने वालों को आईआईटी एडवांस की परीक्षा देनी होती है और उस परीक्षा का आयोजन रोटेशन के आधार पर कोई न कोई आईआईटी ही करता है। जेईई एडवांस परीक्षा में एनटीए का रोल नहीं होता है। अगर सीधे जेईई मेन्स के अंकों के आधार पर आईआईटी में दाखिला होता तो वहां भी उसी तरह पेपर लीक हो रहे होते या दूसरी गड़बड़ियां हो रही होतीं। वह ‘हाई स्टेक एक्जाम’ नहीं है इसलिए वहां पेपर लीक नहीं होता है।

अब सवाल है कि जेईई मेन्स के मुकाबले नीट यूजी क्यों इतना ‘हाई स्टेक एक्जाम’ है? ऐसा इसलिए है क्योंकि इंजीनियरिंग के मुकाबले मेडिकल कॉलेज सीमित हैं। सस्ते व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वाले सरकारी मेडिकल कॉलेजेज की संख्या तो बहुत ही कम है। इंजीनियरिंग के मुकाबले निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई बहुत ज्यादा महंगी है और इंजीनियरिंग के मुकाबले मेडिकल की डिग्री के बाद रोजगार या निजी प्रैक्टिस में कमाई बहुत ज्यादा है। अगर चार साल की मेडिकल की पढ़ाई की फीस एक करोड़ रुपए या उससे ज्यादा होगी तो लोग निश्चित रूप से कुछ लाख रुपए खर्च करके प्रश्न पत्र हासिल करने का प्रयास करेंगे।

पेपर लीक करने या परीक्षा केंद्र फिक्स करने वाले लोग इसका फायदा उठाते हैं। सो, सिर्फ कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा कर देने से पेपर लीक होना या परीक्षा केंद्र फिक्स करने जैसी घटनाएं रूक जाएंगी, यह सोचना सही नहीं है। ऊपर से औसतन 23 लाख छात्रों की परीक्षा कई पालियों में आयोजित करना और फिर उनके अंकों का सामान्यीकरण करना अलग मुश्किल प्रक्रिया है। इसी वजह से पिछले साल नीट पीजी की परीक्षा सुप्रीम कोर्ट ने दो पाली में कराने से रोक दिया था। नीट यूजी की परीक्षा आयोजित करने वालों की सीमा है। वे कह रहे हैं कि एक पाली में दो लाख से ज्यादा बच्चों की कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा नहीं ली जा सकती है।

इसलिए कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा के साथ साथ कुछ और उपायों पर विचार करने की जरुरत है। सबसे पहला उपाय यह हो सकता है कि सरकार एक देश, एक परीक्षा की जिद छोड़े। एक देश, एक परीक्षा के ऑब्सेशन का बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर राज्यों के स्तर पर मेडिकल में दाखिले की परीक्षा हो तो एक साथ 23 लाख बच्चों की परीक्षा कराने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी। अगर किसी राज्य में पेपर लीक हो भी जाए तो पूरे देश की परीक्षा रद्द करने की नौबत नहीं आएगी। राज्यों के मेडिकल कॉलेज की परीक्षा अलग और केंद्र सरकार के मेडिकल कॉलेजेज की परीक्षा अलग आयोजित की जा सकती है।

अखिल भारतीय परीक्षा कराने की एक मुश्किल को लेकर तो तमिलनाडु के पिछले मुख्यमंत्री लगातार लड़ते रहे थे। पहले तमिलनाडु में 12वीं के अंक के आधार पर मेडिकल में दाखिला होता था और स्थानीय स्तर पर, स्थानीय भाषा बोलने वाले डॉक्टर लोगों को उपलब्ध होते थे। इसे अखिल भारतीय परीक्षा में बदलने से वह व्यवस्था प्रभावित हुई। दूसरा उपाय यह होना चाहिए कि मेडिकल की पढ़ाई को सस्ता बनाया जाए। सरकार फीस को विनियमित करे और ज्यादा व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा वाले मेडिकल कॉलेज खोले।

इसके बाद तीसरा उपाय यह हो सकता है कि जेईई मेन्स और एडवांस की तरह मेडिकल में दाखिले के लिए भी दो परीक्षा कर दी जाए। नीट यूजी की परीक्षा के बाद एडवांस परीक्षा के आयोजन का जिम्मा एम्स जैसी संस्था को दी जाए और एडवांस परीक्षा पास करने वालों को ही टॉप मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में दाखिला मिले। चौथा उपाय यह है कि परीक्षा कराने वाली संस्था को जवाबदेह बनाया जाए। पिछले कुछ समय से दाखिला और नियुक्ति की परीक्षाएं आउटसोर्स की जाने लगी हैं। निजी एजेंसियों को परीक्षा के आयोजन में शामिल किया जा रहा है।

एक देश, एक परीक्षा के लिए जिस एनटीए का गठन किया गया। वह भी एक तदर्थ संस्था की तरह है। अलग अलग विभागों के अधिकारियों को लाकर उसमें रख दिया गया। उसका कैडर नहीं है। उसकी इमारत नहीं है। उसके लोग निजी एजेंसियों को ठेका देकर काम कराते हैं। और गड़बड़ी होने पर किसी की जवाबदेही तय नहीं होती है और न किसी को सजा मिलती है। पेपर लीक में कुछ निजी लोगों, कुछ अभिभावकों और कोचिंग संस्थाओं से जुड़े लोगों को पकड़ लिया जाता है और परीक्षा कराने वाली एजेंसियों के छोटे मोटे कर्मचारियों को पकड़ कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। अगर शीर्ष अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाए तो शायद स्थिति में कुछ सुधार हो।

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