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विपक्ष के मुख्यमंत्रियों की घटती संख्या

विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों की संख्या कम हो रही है। एक एक करके राज्य सरकारें उनके हाथों से निकल रही हैं। यह विपक्ष की पूरी राजनीति के लिए चिंता की बात है। विपक्षी पार्टियां भी इस बात को समझ रही हैं कि राज्यों में सरकार नहीं होने के क्या नुकसान हैं। संसाधनों के प्रबंधन से लेकर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर इसका बड़ा असर होता है। वैसे भी इन दिनों एंटी इन्कम्बैंसी से ज्यादा असरदार प्रो इन्कम्बैंसी है खास कर भाजपा के मामले में। भाजपा जहां भी सरकार में है उसे हराना मुश्किल हो गया है। एकाध अपवाद होते हैं लेकिन सरकार में रहते हुए वापस सत्ता में लौटने का भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा है। इसके विपरीत विपक्षी पार्टियों का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत खराब है। एकाथ प्रादेशिक पार्टियां लौटी भी हैं तो कांग्रेस पिछले 15 साल में किसी भी राज्य में लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं लौटी है।

बहरहाल, पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों ने विपक्षी गठबंधन को एक और बड़ा झटका दिया है। विपक्ष के दो मुख्यमंत्री कम हो गए हैं और दोनों बड़े कद्दावर नेता, जो वैचारिक और राजनीतिक रूप से भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बने रहते थे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी चुनाव हार गई और 15 साल के बाद ममता सत्ता से बाहर हो गई हैं। इसी तरह 10 साल के इंतजार के बाद सत्ता में लौटे एमके स्टालिन भी सत्ता से बाहर हो गए हैं। उनकी पार्टी डीएमके चुनाव हार गई। कह सकते हैं कि अन्ना डीएमके के नेतृत्व वाला एनडीए नहीं जीता, बल्कि तीसरे स्थान पर चला गया। परंतु जो जीते हैं विजय वे किसी स्थिति में विपक्ष की वैसी राजनीतु नहीं करेंगे, जैसे स्टालिन करते थे। वे केंद्र के साथ सद्भाव रखेंगे। हालांकि कांग्रेस ने उनको समर्थन देने की शर्त रखी है कि वे भाजपा से तालमेल की बात नहीं करेंगे। लेकिन यह भी खबर है कि विजय अन्ना डीएमके से भी बात कर रहे हैं। सो, अगर कांग्रेस ज्यादा दबाव बनाएगी तो उनके सामने विकल्प है कि वे भाजपा गठबंधन वाली पार्टियों का समर्थन लेकर सरकार चलाएं। सो, ममता बनर्जी और एमके स्टालिन का सत्ता से बाहर होना विपक्ष के लिए बड़ा झटका है।

केरल में यथास्थिति रही है। सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ हारी तो कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ जीता। वहां पिनरायी विजयन की जगह कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनेगा। सो, वहां की जीत हार का विपक्ष की राजनीति पर ज्यादा असर नहीं होगा। इन पांच राज्यों से पहले बिहार में बदलाव हुआ। नीतीश कुमार की जगह भाजपा के सम्राट चौधरी मंत्री बने। नीतीश विपक्षी खेमे में नहीं थे लेकिन भाजपा के साथ रहते हुए भी उनकी राजनीति अलग थी। उनसे हमेशा विपक्षी पार्टियों को एक उम्मीद रहती थी। लेकिन वह उम्मीद भी खत्म हो गई। अब अगले साल के चुनावों पर नजर है। अगले साल के शुरू में पांच राज्यों में और अंत में दो राज्यों में चुनाव है।

इसमें दो विपक्षी मुख्यमंत्रियों की सत्ता दांव पर होगी। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के सुखविंदर सिंह सुक्खू और पंजाब में आम आदमी पार्टी के भगवंत मान। बाकी पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और गुजरात में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री है। भाजपा की कोशिश कम से कम हिमाचल प्रदेश जीतने की जरुर होगी। ध्यान रहे हिमाचल प्रदेश में पांच साल पर सत्ता बदलती है। वैसे पांच साल पर सत्ता बदलने का इतिहास तो उत्तराखंड का भी था लेकिन वहां पिछली बार भाजपा लगातार दूसरी बार जीत गई। अगले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा विपक्षी गढ़ तोड़ रही है। अगर 2028 में परिसीमन होना है तो राज्यों में सरकार होने का लाभ भाजपा को मिलेगा।

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