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पंजाब में आगे क्या करेगी भाजपा?

आम आदमी पार्टी के पंजाब के सात में से छह राज्यसभा सांसद भाजपा के साथ चले गए हैं। इनमें राघव चड्ढा भी हैं, जिनको दिल्ली विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिला कर अरविंद केजरीवाल ने पंजाब भेजा था और वहां से राज्यसभा पहुंचाया था। आम आदमी पार्टी छोड़ने वालों में संदीप पाठक भी हैं, जिन्होंने दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी को बतौर चुनाव रणनीतिकार चुनाव लड़ाया था। वे आप की राजनीतिक मामलों की समिति के सदस्य थे। इन दो के अलावा बाकी सांसदों का कोई मतलब नहीं है। चाहे हरभजन सिंह हों या अशोक मित्तल या राजेंद्र गुप्ता या विक्रमजीत सिंह साहनी हों। इन चारों का पंजाब की राजनीति में कोई मतलब नहीं और न स्वाति मालीवाल का दिल्ली की राजनीति में कोई अर्थ है। मतलब के दो लोग हैं राघव चड्ढा और संदीप पाठक।

अब सवाल है कि इन दो लोगों के दम पर भारतीय जनता पार्टी पंजाब में क्या कर लेगी? क्या पंजाब में आम आदमी पार्टी के विधायकों को तोड़ने का प्रयास किया जाएगा? यह संभव है। इसके कई कारण हैं। पहला, अगले 10 महीने में पंजाब में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। दूसरा, अनेक विधायक किसी न किसी आरोप में फंसे हैं और केंद्रीय एजेंसियां जांच कर रही हैं। तीसरा, भगवंत मान की सरकार के कामकाज से पंजाब में कोई ऐसा माहौल नहीं है कि विधायक जीतने की उम्मीद कर रहे हों। चौथा, राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने पंजाब में आप को चुनाव लड़ाया था और ज्यादातार लोगों को हैंडपिक करके इन लोगों ने टिकट दी थी। सो, उनमें से बहुत से लोग अब भी इनके प्रति निष्ठा रखते हैं। उनको लगेगा कि चड्ढा और पाठक भाजपा जैसी मजबूत और संसाधन से संपन्न पार्टी के साथ मिल कर उनको चुनाव लड़ाएंगे तो क्या पता फिर से जीत जाएं एक रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में आप के विधायकों में से करीब आधे यानी 45 के करीब विधायक चड्ढा और पाठक के नजदीकी हैं और उनके हिसाब से कुछ फैसला कर सकते हैं।

मुश्किल यह है कि पंजाब में भाजपा अकेले दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है। वह आप के आधे क्या सारे विधायकों को भी अपनी पार्टी में शामिल करा कर चुनाव लड़ जाए तब भी वह दहाई में सीट नहीं जीत पाएगी। भाजपा को भी पता है कि आम आदमी पार्टी से जीते लगभग सभी विधायक पार्टी की हवा पर जीते थे। इसलिए भाजपा में आकर सब बोझ बनेंगे। दूसरी संभावना यह है कि आप में विभाजन करा कर भगवंत मान की सरकार गिरवा दी जाए। चड्ढा किसी नेता को आगे करें और वहां वह सरकार बनाने का दावा करे। सरकार नहीं बनने की स्थिति में केंद्र सरकार वहां राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। अस्थिरता का फायदा उठा कर केंद्र सरकार दखल देगी। ऐसा ही जम्मू कश्मीर में हुआ था। ध्यान रहे पंजाब सीमावर्ती राज्य है और वहां के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान की तरफ से हथियार और नशा दोनों भारी मात्रा में सप्लाई किया जा रहा है। ऊपर से कट्टरपंथियों का असर अलग बढ़ रहा है। सो, यह भी एक संभावना है। अगर आप में टूट होती है और एक नई पार्टी का जन्म होता है तो भाजपा उसके साथ तालमेल कर सकती है। हालांकि उससे भी ज्यादा फायदा नहीं होगा। फिर यह संभव है कि भाजपा पंजाब के राजनीतिक स्पेस को और विभाजित करना चाहती हो ताकि चुनाव के बाद सरकार गठन में उसकी और उसके सहयोगियों की भूमिका रहे और अगर फिर भी सरकार न बने तो राष्ट्रपति शासन लगा कर वह शासन अपने पास रख सके। जो हो पंजाब में कुछ दिलचस्प चीजें होती दिख रही हैं।

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