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सरकार के दांव से विपक्ष का फायदा

केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का विधेयक इस राजनीतिक एजेंडे के साथ पेश किया था कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में इसका फायदा हो जाएगा। बंगाल मातृ शक्ति की पूजा करने वाला राज्य है और अगर चुनाव से ऐन पहले महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिल गया तो चुनाव में भाजपा को लाभ होगा। सरकार को अंदाजा था कि विधेयक पास नहीं भी हो सकता है फिर भी इसे पेश किया गया तो यह भी मकसद था कि अगर विपक्ष इसका विरोध करता है तो चुनाव में प्रचार करके उसको कठघरे में खड़ा किया जाएगा और उसको इसका नुकसान भी हो सकता है। लेकिन सरकार के इस दांव से विपक्ष को कोई तरह का फायदा हो गया। एक फायदा तो यह हुआ कि पूरा विपक्ष एकजुट हो गया। डीएमके से लेकर समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस तक सबके सांसद इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ एकजुट हुए। विपक्ष की साझा हैसियत यानी 233 सांसदों की जगह उसको 238 सांसदों का वोट मिला और वह भी तब जबकि ममता बनर्जी की पार्टी के सात सांसद चुनाव प्रचार की वजह से संसद की कार्यवाही में शामिल नहीं हुए थे।

दूसरा फायदा यह होता दिख रहा है कि सरकार के इस दांव ने बचे हुए दोनों चुनावी राज्यों पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव बदल दिया है। पहले पश्चिम बंगाल की बात करें तो ममता बनर्जी ने परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों को अपने फायदे में इस्तेमाल कर लिया है। हालांकि इससे चुनाव नतीजों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है लेकिन मतदान से ठीक पहले मुद्दे की तलाश कर रहीं ममता बनर्जी को भाजपा ने दो बड़े मुद्दे दे दिए हैं। भाजपा ने अपने जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को उत्तरी बंगाल में पूरी ताकत से प्रचार में उतार दिया है। वहां पहले चरण में वोटिंग होनी है। उत्तरी बंगाल की 54 सीटों में से पिछली बार भाजपा ने 30 सीटें जीती थी और कई सीटों पर हारने का अंतर बहुत कम था। ममता वहां प्रचार कर रही हैं कि परिसीमन के जरिए भाजपा इस क्षेत्र को बंगाल से अलग करने की साजिश कर रही है या परिसीमन के जरिए इस क्षेत्र की लोकसभा व विधानसभा सीटों की संरचना बदलना चाहती है। दूसरे क्षेत्रों में भी यह प्रचार हो रहा है लेकिन उत्तर बंगाल में भाजपा को इसका ज्यादा नुकसान हो सकता है। वहां यह अपील काम कर रही है। इसी तरह ममता ने महिला आरक्षण को लेकर तथ्य सामने रखे हैं। उन्होंने बताया है कि लोकसभा में उन्होंने 40 फीसदी सीटें महिलाओं को दी थी और विधानसभा में भी उनकी 55 महिला उम्मीदवार है, जबकि भाजपा ने सिर्फ 32 महिलाओं को टिकट दी है।

इसी तरह तमिलनाडु में भी चुनाव पूरी तरह से बदल गया है। अब समूचा प्रचार परिसीमन के ईर्द गिर्द है। इसके खिलाफ सबसे मुखर एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके है और दूसरी पार्टी जो मुखर है वह जोसेफ विजय की टीवीके है। इनके मुकाबले अन्ना डीएमके बैकफुट पर है। भाजपा के नेता जरूर किसी न किसी तर्क से परिसीमन का बचाव कर रहे हैं लेकिन उनकी बात कोई नहीं सुन रहा है। तमिलनाडु में संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन बिल की कॉपी जला कर सही किया या गलत उसकी व्याख्या होगी। लेकिन उन्होंने इसका राजनीतिक इस्तेमाल कर लिया। काले कपड़े पहन कर स्टालिन ने प्रचार किया तो उनके सांसदों ने संसद में भी काले कपड़े पहने। बिल की कॉपी जलाई और परिसीमन को तमिलनाडु की राजनीतिक हैसियत घटाने वाला बताया। इससे अस्मिता की राजनीति को बल मिला है। ध्यान रहे एमके स्टालिन लगातार तमिल पहचान के मुद्दे पर ही चुनाव प्रचार कर रहे हैं। भाजपा ने बैठे बिठाए उनके एजेंडे को मजबूती देने वाला मुद्दा दे दिया।

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