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बिना कानून बने संशोधन हो रहा था

सोचें, सरकार नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के बिल को लेकर कितनी अगंभीर थी कि उसने इस कानून को लागू किए बगैर ही संशोधन का प्रस्ताव पेश कर दिया था। इससे यह भी साफ हो रहा है कि सरकार सब कुछ दिखावे के लिए कर रही थी। उसको असल में कानून नहीं बनवाना था। उसे असल में पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले एक मुद्दा चाहिए था। सरकार को भी पता है कि नारी शक्ति वंदन कानून पहले से है और उसे एक टाइमलाइन पर लागू कर दिया जाएगा। लेकिन बंगाल के चुनाव में अगर महिला आरक्षण का मुद्दा बन जाए तो उसका लाभ हो सकता है। सरकार कितनी अगंभीर थी और कैसे उसने बिना तैयारी के इसे पेश किया था इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि अमित शाह कह रहे थे कि लोकसभा की सीटें साढ़े आठ सौ कैसे होंगी और इस बात का बिल में जिक्र भी नहीं था। जब मामला उठा तो सरकार ने कहा कि एक घंटे का समय दीजिए और बिल पास कराने को तैयार हो जाइए तो 50 फीसदी सीट बढ़ाने का प्रावधान बिल में कर दिया जाएगा।

बहरहाल, बिना बेसिक तैयारी के सरकार ने तीन दिन का सत्र बुला दिया और संशोधन कानून पेश कर दिया। सोचें, संविधान के 131वें संशोधन बिल सहित दो और बिल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मंजूरी दी गई। उसके बाद 16 मार्च को उसे लोकसभा में पेश किया गया। जब बिल पेश हो गया तब पता चला कि इसे अभी तक सरकार ने अधिसूचित ही नहीं किया है। यानी बिल सितंबर 2023 में पास हो गया और राष्ट्रपति के दस्तखत से कानून बन गया लेकिन 16 अप्रैल 2026 तक उसे लागू नहीं किया गया। सवाल है कि जो कानून लागू नहीं हुआ है उसे कैसे संशोधित किया जाएगा। सो, आनन फानन में 16 अप्रैल की रात को कानून को अधिसूचित किया गया। विपक्ष ने भी अगले दिन इस लापरवाही की ओर इशारा किया। लेकिन सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह जानती थी कि किस मकसद से बिल लाया जा रहा है।

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