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विपक्ष को बनानी होगी रणनीति

कांग्रेस पार्टी वैसे ही महिला आरक्षण के पक्ष में रही है, जैसे भाजपा रही है। दोनों बड़ी पार्टियों की बारी बारी से सरकार बनती थी, दोनों ऐलान करते थे कि वे महिला आरक्षण लागू करेंगे और दोनों लागू नहीं करते थे। यह खेल तीन दशक से चल रहा है। बाकी सारे बिल पास हो जाते थे सिर्फ महिला आरक्षण का बिल पास नहीं हो पाता था। खैर, अब वह भी हो गया है। लेकिन इस बार नई समस्या है। इस बार समस्या यह है कि जो कानून पास हुआ है वह लागू नहीं हुआ और लागू होने से पहले ही उसमें संशोधन किया जाना है ताकि उसे लागू किया जाए। सोचें, इस देश में इस तरह से कानून बनता है! खैर, कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की दुविधा है कि वे कैसे कदम उठाए हैं, जिससे महिला आरक्षण कानून लागू होने का राजनीतिक लाभ उनको भी मिले।

इस पर विचार के लिए कांग्रेस पार्टी ने संसद का सत्र शुरू होने से एक दिन पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। तात्कालिक रूप से यह मामला सबसे ज्यादा जरूरी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए है। यह सारा खेल इस समय इसलिए रचा जा रहा है ताकि बंगाल के चुनाव में महिला मतदाताओं को प्रभावित किया जा सके। अन्यथा कोई जरुरत नहीं थी कि अभी दो राज्यों में मतदान होना है उस बीच संसद सत्र बुला कर महिला आरक्षण बिल को पास कराया जाए। सरकार ने तो अपनी तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी लेख लिख रहे हैं, वीडियो संदेश जारी कर रहे हैं, सांसदों को चिट्ठी लिख रहे हैं। अब सवाल है कि विपक्ष क्या करे? विपक्ष को महिला आरक्षण कानून पास होने से बनने वाले नैरेटिव से मुकाबले की चिंता है और परिसीमन की भी चिंता है। परिसीमन में विपक्ष ज्यादा फंसता दिख रहा है। मुश्किल यह है कि सरकार परिसीमन पर नहीं महिला आरक्षण पर फोकस कर रही है और महिला आरक्षण के लिए परिसीमन को जरूरी बना दिया है। ऐसे में विपक्ष इसका विरोध भी नहीं कर सकता है। इसलिए देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष क्या रणनीति बनाता है और तीन दिन की संसद की कार्यवाही में उसका काउंटर नैरेटिव क्या होता है?

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