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बंगाल में मुस्लिम वोट कटने का मिथक

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची फ्रीज कर दी है और करीब 27 लाख नाम मतदाता सूची से बाहर रह गए हैं क्योंकि तार्किक विसंगति के आधार पर जिन 60 लाख लोगों के नाम विवेचनाधीन श्रेणी में रखे गए थे उनमें से 27 लाख लोगों के दस्तावेज पर्याप्त नहीं पाए गए हैं। इन लोगों के पास अभी ट्रिब्यूनल में अपील दायर करने का अवसर है लेकिन उससे पहले मतदाता सूची फ्रीज हो गई है। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होना है। इसलिए प्रशासनित विफलता के कारण इतने लोग बाहर छूट गए हैं। उसके बाद से यह प्रचारित किया जा रहा है कि सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं के नाम कटे हैं। कई जानकारों ने तो 80 से 90 फीसदी मुस्लिम नाम कटने का दावा किया। उन्होंने सोशल मीडिया में पोस्ट डाली। मतदाता सूची फ्रीज होने से पहले चुनाव आयोग ने भी बताया कि मुर्शिदाबाद में साढ़े चार लाख या मालदा में तीन लाख से ज्यादा नाम कटे हैं। इससे भी मुस्लिम नाम कटने का दावा ज्यादा प्रचारित हुआ।

इसमें संदेह नहीं है कि आबादी के अनुपात में मुस्लिम मतदाताओं के नाम ज्यादा कटे हैं। बंगाल में मुस्लिम आबादी 27 फीसदी से थोड़ी ज्यादा है लेकिन अंतिम मतदाता सूची में 34 फीसदी मुस्लिमों के नाम कटे हैं। सो, आबादी के अनुपात में सात फीसदी ज्यादा नाम कटे हैं लेकिन इससे यह पता चलता है कि जो बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है उसके मुकाबले बहुत कम नाम कटे हैं। 63 फीसदी से ज्यादा हिंदुओं के नाम कटे हैं। बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी की भबानीपुर सीट पर 51 हजार नाम कटे हैं। इसमें मुस्लिम मतदाता 13 हजार के करीब हैं और बाकी 37 हजार से ज्यादा नाम हिंदू मतदाताओं के कटे हैं। इसके बावजूद मुस्लिम मतदाताओं के नाम ज्यादा कटने की बात एक नैरेटिव गढ़ने के मकसद से प्रचारित किया जा रहा है। हिंदुओं में भी सबसे ज्यादा नाम मतुआ और राजबंशी समुदाय के लोगों के कटे हैं। दलित समुदाय के ये मतदाता भाजपा के समर्थक माने जाते हैं।

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