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उप सभापति की समस्या सुलझ गई क्या?

जनता दल यू के हरिवंश नारायण सिंह रिटायर हो रहे थे तो केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के सामने एक बड़ी समस्या थी कि किसको राज्यसभा का उप सभापति बनाया जाएगा। पहले से चली आ रही परंपरा के मुताबिक भाजपा विपक्षी पार्टियों में से किसी को यह पद देना नहीं चाहती है और थोड़े लोक लिहाज की वजह से खुद अपने पास रखना नहीं चाहती है। सो, उसके लिए जदयू के हरिवंश नारायण सिंह सबसे अच्छा विकल्प थे। वे रिटायर हुए और अगर उनकी वापसी नहीं होती तो भाजपा के सामने बड़ी समस्या आती। ध्यान रहे बीजू जनता दल से भाजपा की सीधी लड़ाई हो गई है। ओडिशा में बीजद मुख्य विपक्षी पार्टी है। इसलिए उसके किसी नेता को यह पद नहीं दिया जा सकता था। आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी का सद्भाव भाजपा के प्रति रहा है। लेकिन वहां चूंकि तेलुगू देशम पार्टी से भाजपा का तालमेल है। इसलिए जगन के प्रति सद्भाव दिखाया ही नहीं जा सकता है।

गौरतलब है कि पिछली लोकसभा में जब इन दोनों पार्टियों के साथ भाजपा का सद्भाव था और दोनों मुद्दा आधारित समर्थन दे रहे थे तब भी भाजपा की ओर से इस पद का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन दोनों पार्टियों ने इसे ठुकरा दिया था। इन दोनों के अलावा महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी पार्टियों के पास गिने चुने सांसद हैं, जिनको उप सभापति नहीं बनाया जा सकता है। नीतीश कुमार की पार्टी ने हरिवंश को तीसरी बार राज्यसभा भेजने से इनकार कर दिया। इसका कारण यह था कि उसके अपने कोटे में इस बार दो सीटें मिल रही थीं, जिनमें से एक सीट पर खुद नीतीश कुमार को राज्यसभा जाना था और दूसरी सीट रामनाथ ठाकुर की थी, जो केंद्र में मंत्री हैं। वे कर्पूरी ठाकुर के बेटे हैं और बिहार की राजनीति में जनता दल यू का अति पिछड़ा चेहरा हैं। इसलिए उनको नहीं रोका जा सकता है। वे भी तीसरी बार राज्यसभा भेजे गए हैं। तभी इस समस्या का समाधान यह निकाला गया गया कि हरिवंश नारायण सिंह को राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की सीट मार्च में खाली हुई थी। उनकी जगह हरिवंश को भेज दिया गया। अब सवाल है कि क्या इससे उप सभापति की समस्या सुलझ गई? ऐसा लग रहा है क्योंकि संविधान और राज्यसभा के नियमों में इस बात का जिक्र नहीं है कि मनोनीत सदस्य उप सभापति नहीं बन सकता है। वहां उप सभापति बनने की एक ही अर्हता है और वह है उच्च सदन का सदस्य होना। इसका मतलब है कि निर्वाचित सदस्य भी उप सभापति हो सकता है और मनोनीत सदस्य भी हो सकता है। इसलिए संभव है कि एक बार फिर से हरिवंश को उप सभापति बना दिया जाए। इसी मकसद से उनको मनोनीत भी किया गया हो सकता है। क्योंकि जब यह तय हो गया था कि नीतीश कुमार की पार्टी उनको तीसरी बार राज्यसभा नहीं भेज रही है तभी से उप सभापति के नाम की अटकलें लगने लगी थीं और यह भी कहा जाने लगा था कि अगर कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिलता है तो राज्यसभा में भी उप सभापति का पद खाली रह सकता है। ध्यान रहे लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद लगभग सात साल से खाली है। पिछली लोकसभा में उपाध्यक्ष चुना ही नहीं गया और इस लोकसभा का भी दो साल का कार्यकाल पूरा होने वाला है। संभव है कि राज्यसभा में लोकसभा वाली स्थिति नहीं रहेगी। हरिवंश को लेकर यह भी खास बात है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों की पसंद बने रहे। इससे पहल ऐसी स्थिति आरसीपी सिंह को लेकर आई थी। लेकिन उनके प्रति नीतीश की नाराजगी थी तो भाजपा ने भी उन्हें कुछ नहीं दिया।

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