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हरदीप पुरी के लिए मुश्किल

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अच्छे दिन समाप्त होते लग रहे हैं। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी प्रतिनिधि थे। उसके बाद भाजपा में शामिल हुए तो उनको सब कुछ मिला। वे अमृतसर से चुनाव लड़े और हारने के बाद भी केंद्र में मंत्री बने। उत्तर प्रदेश से उनको राज्यसभा भेजा गया। वे शहरी विकास और पेट्रोलियम जैसे अहम मंत्रालयों में रहे। पिछले कुछ समय से उनकी ग्रह दशा बिगड़ी हुई है। एक तो अमेरिका में एपस्टीन फाइल खुली तो उनके कई पत्राचार सामने आ गए। कांग्रेस पार्टी ने उनके कई ईमेल्स जारी किए। इस मामले में वे बच गए क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने इस्तीफा नहीं कराने का नियम बना रखा है। यह अघोषित नियम है कि चाहे कितना भी बड़ा आरोप लगे मंत्री का इस्तीफा नहीं लेना है। हां, अगर मंत्री में कुछ नैतिकता हो और वह इस्तीफा दे दे तो अलग बात है, जैसे मी टू अभियान में नाम आने के बाद एमजे अकबर ने दे दिया था। उसके बाद चुपचाप वे नेपथ्य में चले गए। हरदीप पुरी ने इस्तीफा नहीं दिया तो इसका यह मतलब नहीं है कि वे बच जाएंगे।

उनकी मुश्किल सिर्फ एपस्टीन फाइल ये परिवार के सदस्यों से जुड़ी संस्थाओं में कथित विदेशी फंडिंग का नहीं है, बल्कि ईरान जंग से भी सीधे वे सवालों के घेरे में आए हैं। हालांकि इसमें उनका कोई खास कसूर नहीं है लेकिन चूंकि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय उनके पास है और आज देश में लोग तेल और गैस की कमी से जूझ रहे हैं। सरकार को भी आने वाले दिनों में एक ऐसे व्यक्ति की तलाश होगी, जिसे बलि का बकरा बनाया जा सके। हरदीप पुरी वह व्यक्ति हो सकते हैं। एपस्टीन फाइल्स और तेल व गैस के संकट दोनों का ठीकरा उनके ऊपर फूट सकता है। ऐसा लग रहा है कि भाजपा की ओर से इसकी तैयारी भी शुरू हो गई है। ध्यान रहे अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले भाजपा ने सिख नेताओं को आगे करके मैसेजिंग शुरू कर दी है। आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे एचएस फुल्का का भाजपा में शामिल होना इसी बात का संकेत है।

गौरतलब है कि हरदीप पुरी की राज्यसभा का कार्यकाल इस साल नवंबर में खत्म होगा। नवंबर में उत्तर प्रदेश की नौ और उत्तराखंड की एक सीट खाली हो रही है। पुरी उस समय रिटायर होंगे। ज्यादा संभावना है कि उससे पहले उनका मंत्री पद चला जाए और फिर राज्यसभा नहीं मिले। सवाल है कि क्या फुल्का को भाजपा राज्यसभा भेजेगी या पंजाब में उनको विधानसभा का चुनाव लड़ाया जाएगा? फुल्का की छवि सिख समुदाय में बहुत अच्छी है। उन्होंने दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के पीड़ित लोगों का मुकदमा लड़ा था। उनकी इस छवि का लाभ आम आदमी पार्टी को दिल्ली से लेकर पंजाब तक हुआ लेकिन आप ने उनको राज्यसभा नहीं भेजा। अगर भाजपा भेजती है तो उसे इसका लाभ होगा। फुल्का के भाजपा में शामिल होने से पहले अमेरिका में भारत के राजदूत रहे पूर्व आईएफएस अधिकारी तरणजीत सिंह संधु को दिल्ली का उप राज्यपाल बनाया गया। यह सब पंजाब चुनाव की तैयारी है। लोकसभा चुनाव हारे रवनीत सिंह बिट्टू को केंद्र में मंत्री बना कर भाजपा ने पहले भी सिख समुदाय को मैसेज किया था। सो, ऐसा लग रहा है कि हरदीप सिंह पुरी की भूमिका कम हो रही है और नए चेहरे आगे किए जा रहे हैं।

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