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जिहादी मानसिकता का सिलसिला – Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

गत 29 मार्च को दिल्ली पुलिस ने आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के खूंखार जिहादी अहमद लोन उर्फ राजा कश्मीरी को दबोच लिया। बकौल मीडिया रिपोर्ट, उसकी कुदृष्टि राजधानी के पवित्र कालकाजी मंदिर और कनॉट प्लेस जैसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों पर थी। पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर वह लश्कर के लिए भारतीय मुस्लिम युवाओं की भर्ती का जाल बुन रहा था। यह कोई अकेली हालिया घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही देश के विभिन्न राज्यों में चलाए गए एक बड़े आतंकवाद-रोधी अभियान के तहत सुरक्षा एजेंसियों ने आई.एस.-अलकायदा से जुड़े 12 संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक बाइक टैक्सी चालक मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ, रेस्तरां कर्मचारी मिर्जा सोहेल बेग और लेजर मार्किंग विशेषज्ञ मोहम्मद दानिश है।

लब्बोलुबाब यह है कि जिस मानसिकता के साथ मोहम्मद बिन कासिम ने आठवीं शताब्दी में सनातन भारत पर हमला किया, फिर उसके मानसबंधुओं ने सदियों तक जिहाद किया, इस दौरान हिंदू-बौद्ध बहुल अफगानिस्तान का इस्लामीकरण हो गया, 1947 में देश को इस्लाम के नाम पर तकसीम किया गया और 1980-90 के दौर में कश्मीर को हिंदू-विहीन कर दिया गया— वह जिहादी चिंतन अब भी अपरिवर्तित है, चाहे कोई उच्च-शिक्षित ही क्यों न हो।

इन गिरफ्तारियों से पहले पिछले साल नवंबर में दिल्ली में चलती कार में हुए भीषण विस्फोट— जिसे फिदायीन डॉ। उमर उन नबी ने अंजाम दिया था— उसमें कई लोगों की जान चली गई थी। उस समय दिल्ली के नजदीक फरीदाबाद से लगभग 3000 किलो विस्फोटक, हथियारों का जखीरा और बम बनाने के उपकरणों के साथ अल-फलाह अस्पताल के कई जिहादी डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया था। उसी क्रम में गुजरात पुलिस ने डॉ। अहमद मोहिउद्दीन सैयद को उसके दो सहयोगियों के साथ पकड़ा था, जो अरंडी के बीजों से घातक राइसिन जहर तैयार कर रहा था, ताकि पानी और भोजन के जरिए बड़े नरसंहार को अंजाम दिया जा सके।

अब सवाल है— क्या यह सब अचानक हो रहा है? क्या यह केवल पिछले कुछ वर्षों की तथाकथिक राजनीति की उपज है? या फिर यह उस लंबी मानसिकता का विस्तार है, जो सदियों से अवसर मिलते ही सिर उठाती है? यदि कोई इन घटनाओं को केवल ‘ताजा हालात’ मानकर समझना चाहता है, तो वह सच से आंख चुरा रहा है। वास्तव में, भारतीय उपमहाद्वीप में एक वर्ग आज भी उन्हीं आक्रांताओं— कासिम, गजनवी, गोरी, बाबर, औरंगजेब, अब्दाली को अपना ‘नायक’ मानता है, जिन्होंने इस भूखंड पर ‘काफिर-कुफ्र’ की अवधारणा से प्रेरित होकर कत्लेआम किया, मंदिर तोड़े और सांस्कृतिक अस्मिता को रौंदा। इस सोच का एक हिस्सा आज भी ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसे खतरनाक मंसूबे को मजहबी जिम्मेदारी मानता है। यही कारण है कि अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया, तब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कई छात्र पाकिस्तानी सेना में भर्ती हो रहे थे। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर की रियासती सेना में कई मुस्लिम टुकड़ियां भी मजहब के नाम पर शत्रुओं से जा मिलीं थी।

यह भी स्थापित तथ्य है कि भारत का विभाजन कराने वाले न तो बाहर से आए थे, न ही उसके सभी राजनीतिक समर्थक बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए। यदि ऐसा होता, तो शायद खंडित भारत में मुस्लिम अलगाववाद-कट्टरवाद धीरे-धीरे समाप्त हो जाता या फिर वे इंडोनेशिया-मलेशिया की तरह स्थानीय सनातन संस्कृति से सहज तालमेल बिठा लेते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत-हिंदू विरोधी मार्क्स-मैकॉले मानसपुत्रों ने ‘सेकुलरवाद’ के नाम पर इस प्रक्रिया शुरू ही नहीं होने दिया। नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम समाज के एक वर्ग के लिए ‘लोकतंत्र’ और ‘संविधान’ विकास या सुधार न होकर केवल पहचान की राजनीति तक सिमट गया है।

आजादी के बाद सितंबर 1947 में दिल्ली की घटना इस मानसिकता को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देती हैं। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “पुलिस द्वारा मुस्लिम घरों और मस्जिदों की तलाशी में बम, हथियार और गोला-बारूद के बड़े भंडार बरामद हुए थे।” यह भीड़ की अचानक हिंसा नहीं, बल्कि दिल्ली पर फिर से इस्लामी परचम लहराने की तैयारी थी। तब यह स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई, क्योंकि पुलिसबल का एक बड़ा मुस्लिम वर्ग अविश्वसनीय निकला। तब सरकार को दूसरे राज्यों से फौज बुलानी पड़ी। उस समय दिल्ली एक प्रकार के भीषण जिहाद से जूझ रही थी।

सरदार पटेल ने जिस दृढ़ता से इस मजहबी उन्माद का सामना किया, वह आज भी उदाहरण है। प्यारेलाल द्वारा लिखित ‘महात्मा गांधी: द लास्ट फेज’ (खंड 2) के अनुसार, जब पटेल को बताया गया कि एक इमारत से मुस्लिमों द्वारा लगातार गोलीबारी हो रही है और उसे हटाने के लिए पूरी इमारत को बम से उड़ाना पड़ेगा, तो पटेल का जवाब था— “तो फिर किया क्यों नहीं?” यह स्पष्ट संदेश था कि देश की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता। फिर भी डी.पी. मिश्रा (दो बार मध्यप्रदेश से कांग्रेसी मुख्यमंत्री) के अनुसार, उस नाजुक दौर में सरदार पटेल को पूरा राजनीतिक समर्थन प्राप्त नहीं था। उस समय भी राष्ट्रीय सुरक्षा को छद्म-सेकुलरवादी राजनीति से चुनौती मिल रही थी। यही विकृति आज भी विभिन्न रूपों में दिखाई देती है।

इन ऐतिहासिक घटनाओं को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय को दोष देना नहीं, बल्कि उस मानसिकता को समझना है, जो समय-समय पर सामने आती है। चाहे लश्कर हो, आईएस या अलकायदा हो या फिर लव-जिहादी— वे सभी एक ही जहरीली मानसिकता से जुड़े हैं। भारत के सामने चुनौती केवल जिहाद से लड़ने की नहीं, बल्कि उस विचारधारा को समझने और रोकने की है, जो इसे जन्म देती है। आतंकवादी अहमद लोन की गिरफ्तारी एक चेतावनी है और एक अवसर भी। सतर्कता इसलिए कि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है, और मौका इसलिए कि हम समय रहते मानसिकता को पहचान सकें।

बीती एक सहस्राब्दी में भारत, सतत जनसांख्यिकीय परिवर्तन (बलपूर्वक सहित) के बीच एक तिहाई भूखंड खो चुका है। शेष भारत, जहां आज भी उसके हिंदू चरित्र के कारण बहुलतावादी सनातन संस्कृति जीवित है— उसे निरंतर पाश्विक शक्तियों से विभिन्न रूपों में चुनौती मिल रही है। इससे मुकाबले करने हेतु सुरक्षा एजेंसियों को सशक्त बनाना जरूरी तो है ही, साथ ही समाज में जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है।

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