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एक बार में राजी नहीं होती है सरकार

संसद का बजट सत्र चल रहा है लेकिन यह सिर्फ इस सत्र की बात नहीं है। हर सत्र में ऐसा होता है कि सरकार किसी भी बात पर एक बार में राजी नहीं होती है। विपक्ष की ओर से जिस बात की मांग की जाती है सरकार पहली बार में उसे खारिज करती है। भले बाद में उसे स्वीकार करे। तभी बजट सत्र के दौरान सांसदों की चर्चा का विषय था कि सरकार पहली बार में विपक्ष की हर मांग को खारिज क्यों करती है? उसी में यह मजाक का विषय था कि विपक्ष को सरकार से जो काम कराना है उसकी उलटी बात कही जाए तो अपने आप काम हो जाएगा। यानी विपक्ष कहे कि अमुक विषय पर चर्चा नहीं होनी चाहिए तब शायद सरकार उस पर तत्काल चर्चा के लिए राजी हो जाए। बहरहाल, हंसी मजाक के अलावा यह एक गंभीर बात है कि सरकार हर बार क्यों विपक्ष को प्रतिद्वंद्वी की तरह देखती है और उसकी बात पहली बार में खारिज करती है?

मिसाल के तौर पर पिछले साल के शीतकालीन सत्र की बात करें तो विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर चर्चा की मांग की तो सरकार ने उसे खारिज कर दिया। सरकार पहले से कहती रही कि चुनाव आयोग पर संसद में चर्चा नहीं हो सकती है क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था है। लेकिन बाद में सरकार चर्चा के लिए राजी हुई और कोई 10 घंटे तक इस पर चर्चा हुई। इसी तरह पिछले साल के मॉनसून सत्र में विपक्ष ने पहले दिन से कहना शुरू किया कि ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा हो लेकिन सरकार राजी नहीं हुई। कई दिन तक गतिरोध बने रहने के बाद सरकार चर्चा के लिए तैयार हुई और अंत में ऑपरेशन सिंदूर पर भी चर्चा हुई। इस तरह के विषयों की लंबी सूची बन सकती है, जिन पर सरकार पहले चर्चा से इनकार करती है और अं में विपक्ष की मांग मान कर चर्चा कराती है।

इसी तरह संसद के चालू बजट सत्र में विपक्षी पार्टियां पश्चिम एशिया में चल रही जंग पर चर्चा की मांग कर रही हैं। लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि सरकार की ओर से संसद में इस पर बयान दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले लोकसभा में और फिर राज्यसभा में इस पर बयान दिया। उन्होंने युद्ध के हालात, भारत पर होने वाले असर और उससे निपटने की तैयारियों के बारे में बताया। हालांकि इसमें भी सरकार पहले से बनी परंपराओं का पालन नहीं करती है। राज्यसभा में एक परंपरा रही है कि अगर सरकार किसी मसले पर स्वतः बयान देती है तो सदस्यों को उनसे सवाल पूछने और स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार होता है। लेकिन पश्चिम एशिया संकट पर विदेश मंत्री एस जयशंकर और प्रधानमंत्री मोदी के स्वतः आगे बढ़ कर दिए गए बयान पर सांसदों को स्पष्टीकरण नहीं मांगने दिया गया। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने इसकी इजाजत नहीं दी। बहरहाल, विपक्ष के नेताओं का कहना है कि भले सरकार अभी तैयार नहीं हुई है लेकिन दो अप्रैल को यह सत्र खत्म होने से पहले या चुनाव के बाद होने वाले सत्र में जरूर पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा होगी। ऐसा लग रहा है कि विपक्ष को पक्का अंदाजा हो गया है कि सरकार किस तरह से फैसले करती है।

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