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डीएमके पर रहेगा सारा दारोमदार

ऐसा लग रहा है कि इस बार संसद के मानसून सत्र में सरकार अगर नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का बिल लाती है तो सबसे बड़ी भूमिका एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके की रहने वाली है। समाजवादी पार्टी के उससे ज्यादा सांसद हैं लेकिन सपा की लाइन तय है। वह विपक्ष के साथ है। यह अलग बात है कि भाजपा की ओर से सपा के सांसदों को तोड़ने की कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि कई लोगों को विधानसभा चुनाव लड़ने का ऑफर दिया जा रहा है। कुछ सांसदों के परिजनों को लड़ाने की बात हो रही है। लेकिन इक्का दुक्का सांसदों के टूटने से ज्यादा फर्क नहीं आएगा। क्योंकि सरकार को अब भी 360 वोट की जरुरत होगी और उसके पास 320 हैं। या तो वह 40 सांसद जुटाए या करीब 60 सांसदों को गैरहाजिर कराए तभी उसका काम होगा। तभी डीएमके की भूमिका बहुत अहम है।

गौरतलब है कि डीएमके नेता एमके स्टालिन ने परिसीमन विधेयक पर सबसे सख्त रुख अपनाया था। उन्होंने काले कपड़े पहन कर बिल की कॉपी जलाई थी। उनके सांसदों ने संसद में भी काले कपड़े पहन कर विरोध जताया था। अब सवाल है कि वे कैसे इस बिल का समर्थन करेंगे? कहा जा रहा है कि सरकार की ओर से उनको समझाया जा रहा है कि अगर वे इस बिल का समर्थन नहीं करते हैं तो सरकार इंतजार करेगी और संविधान के उस प्रावधान के लागू करेगी, जिसमें 2026 के बाद की पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों की संख्या तय करने का प्रावधान है। इसमें तमिलनाडु को नुकसान हो सकता है। लेकिन अगर स्टालिन सरकार की बात मान जाते हैं तो सरकार 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन करेगी और अभी जितनी सीटें हैं उनमें सीधे 50 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी जाएगी। कहा जा रहा है कि स्टालिन इस प्रस्ताव पर विचार कर रहे हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि चंद्रबाबू नायडू उनके संपर्क में हैं और उनको समझा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि टीवीके सरकार के खिलाफ डीएमके का जो भी प्रयास होगा उसको भाजपा भी समर्थन देगी। सो, अगर डीएमके के 22 सांसद सरकार के साथ हुए तो विपक्ष के हाथ से बाजी निकल जाएगी।

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