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प्रभु वर्ग में दरार के आरंभिक लक्षण

मुद्दा है कि प्रभु वर्ग के एक हिस्से में मोहभंग से उपजी प्रतिक्रिया कितनी धारदार और कितनी व्यापक होगी? जब विपक्षी दल विश्वसनीयता की चुनौती का सामना कर रहे हैं, तो यह सवाल भी अहम हो जाता है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं के व्यक्त होने का माध्यम क्या होगा? इस बारे में शुरुआती कयास लगाने से ज्यादा अभी हम कुछ समझ या कह पाने की स्थिति में नहीं हैं।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की परिघटना को भारतीय इलीट (प्रभु वर्ग) में एक नई, एवं महत्त्वपूर्ण दरार पड़ने का ठोस संकेत समझा जा सकता है। छह जून को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए इस कथित पार्टी के प्रदर्शन ने इस धारणा की पुष्टि की कि प्रभु वर्ग का जो हिस्सा “भारत उदय” की आकांक्षा में धर्मनिरपेक्षता या उदारवाद जैसे उसूलों को “स्थगित करने” के लिए तैयार होकर भारतीय जनता पार्टी के पीछे लामबंद हुआ था, वह फिलहाल मोहभंग की स्थिति से गुजर रहा है। जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए नौजवानों की जुबान पर सबसे ज्यादा जो शब्द आया, वह है- जवाबदेही। वे देश की शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था के ध्वस्त होने की जवाबदेही तय किए जाने की मांग कर रहे थे। इसीलिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उनकी प्रमुख मांग बनी।

यहां ये गौरतलब है कि ‘कॉकरोच’ के रूप में इकट्टा हुए जुटे अधिकांश युवा अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से आए हैं। ये उन परिवारों से आए हैं, जो ऊंचे करियर का सपना संजो सकने की हैसियत रखते हैं। आज जबकि गहराती आर्थिक समस्याओं के कारण उच्च/ धनी वर्ग को छोड़ कर बाकी तमाम तबकों का जीवन स्तर गिरने लगा है और नई पीढ़ी के लिए बढ़ती अवसरहीनता का शिकार उच्च मध्य एवं मध्य वर्ग के नौजवान भी बनने लगे हैं, तो उन तबकों में हो रही प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति ‘कॉकरोचों’ के बयान, सोशल मीडिया पोस्ट्स और रील्स के जरिए होती दिखी है।

इसके महत्त्व को समझने से पहले जरूरी है कि भाजपा के पीछे हुई प्रभु वर्ग की लामबंदी की पृष्ठभूमि पर गौर किया जाए। ये कहानी 1990 के दशक के साथ शुरू होती है, जब बाबरी मस्जिद ढाहने के आंदोलन के साथ भाजपा का उदय शुरू हुआ। चूंकि ये राजनीति इंकलाब और समाजवाद जैसे ऊंचे सपनों को हाशिये की ओर धकेलने में कारगर साबित होती दिखी, तो स्वाभाविक था कि प्रभु वर्ग का बड़ा हिस्सा इसका समर्थक बना। राजनीतिक शब्दावली में इसे दक्षिणपंथ एवं सांप्रदायिकता का मेल भी कहा जा सकता है।

यह पहलू अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि दक्षिणपंथ एवं सांप्रदायिकता- दोनों एक ही प्रवृत्ति नहीं हैं, जैसाकि आज अक्सर समझ लिया जाता है। दक्षिणपंथ असल में आर्थिक सोच है, जबकि भारत में सांप्रदायिकता की राजनीति (वास्तविक या बनावटी) सांस्कृतिक मुद्दों पर खड़ी हुई है। आजादी के बाद भारत में दक्षिणपंथी राजनीति का मूल चरित्र धर्मनिरपेक्ष था। इसका प्रमुख चेहरा चक्रवर्ती राजगोपालाचारी यानी राजाजी थे। राजनीति में ये विचारधारा स्वतंत्र पार्टी के रूप में संगठित हुई। दक्षिणपंथी नजरिए से नेहरूवादी आर्थिक नीतियों की ठोस आलोचना इसी पार्टी ने तब प्रस्तुत की थी।

गुजरे 100 साल से हिंदू सांप्रदायिकता का सबसे प्रमुख प्रतिनिधि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहा है, जिसने अपनी राजनीतिक शाखा के रूप में 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यही पार्टी आज भारतीय जनता पार्टी के रूप में मौजूद है, जो फिलहाल इस देश की प्रमुख राजनीतिक धुरी है। लालकृष्ण आडवाणी भारतीय जनसंघ/ भाजपा के सर्व-प्रमुख चेहरों में एक रहे हैं। बौद्धिकता के लिहाज से उसके तमाम चेहरों के बीच उनकी छवि सबसे ऊपर रही है। एक समय वे पार्टी के सिद्धांतकार माने जाते थे।

भाजपा नेता और अब पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने अपनी किताब- Awakening Bharat Mata- में भाजपा की वैचारिक यात्रा का विश्लेषण किया है। इसी क्रम में उन्होंने लिखा है कि आडवाणी ने उनसे बातचीत के दौरान स्वीकार किया था कि भाजपा का अपना कोई खास आर्थिक मॉडल नहीं रहा। भाजपा की मूल पहचान और मुख्य ताकत ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक मुद्दे’ हैं। आडवाणी ने दासगुप्ता से कहा था कि आर्थिक मुद्दों पर भाजपा सामयिक जरूरतों के मुताबिक रुख तय करती रही है।

यह याद करना उचित होगा कि 1990 के दशक के आरंभ में जब पी.वी. नरसिंह राव सरकार ने उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों पर अमल शुरू किया, तो भाजपा ने उसका पुरजोर विरोध किया था। लेकिन जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में वह सत्ता आई, तो वह इन नीतियों की वाहक बन गई। तब जाकर उसमें सांप्रदायिकता और दक्षिणपंथ का मिलन हुआ।

ये रुझान किस तरह आगे बढ़ा, इसे समझने के लिए लेखक और स्तंभकार गुरचरण दास में आए परिवर्तनों पर ध्यान देना चाहिए। ‘India Unbound’, और ‘The Dilemma of an Indian Liberal’ जैसी किताबों के लेखक दास खुद को भारत की बहुलवादी संस्कृति का समर्थक बताते हैं। वे हर तरह के धार्मिक कट्टरवाद और बहुसंख्यक-वर्चस्व (Majoritarianism) के विरोधी हैं। लेकिन 2013-14 में जब भारतीय राजनीति के क्षितिज पर नरेंद्र मोदी का उदय हुआ, तो उन्होंने ये सिद्धांत गढ़ा कि भारत के आर्थिक विकास के लिए फिलहाल धर्मनिरपेक्षता को स्थगित किया जा सकता है। (https://timesofindia.indiatimes।com/blogs/men-and-ideas/secularism-or-growth-the-choice-is-yours/)

ऐसी समझ रखने वाले व्यक्तियों की मुश्किल अब यह है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस आर्थिक विकास का सपना उन्होंने देखा, वह तो हुआ नहीं- धर्मनिपरेक्षता और राजनीतिक उदारवाद की धज्जियां जरूर उड़ गईं। जब ये हकीकत सामने आने लगी, तो गुरचरन दास जैसे लोगों का मोहभंग शुरू हुआ। वे अपनी दुविधा सार्वजनिक रूप से जताने लगे (https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/men-and-ideas/indians-grapple-with-a-dickensian-dilemma-of-growth-and-secularism/)। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

गुरचरण दास आज खुद को ‘अकेला उदारवादी’ (Lonely Liberal) मानते हैं। उन्होंने कहा है कि जब उन्होंने 2014 में भाजपा को वोट दिया, तो उन्होंने अपने वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष दोस्तों को खो दिया। और जब उन्होंने 2016 की नोटबंदी, गुजरात दंगों और भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति की आलोचना की, तो उन्होंने अपने दक्षिणपंथी दोस्तों को भी खो दिया। इस रूप में गुरचरण दास एक प्रतीक हैं। एक ऐसा ही प्रतीक स्वराज्य पत्रिका है, जिसकी स्थापना राजाजी के दिशा-निर्देशन में हुई थी। बीच में बंद होने के बाद 2014 में जब वेबसाइट के रूप में इसका पुनर्जन्म हुआ, तो ये नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक के रूप में सामने आई। यहां तक कि कई बार उस पर झूठी खबरें फैलाने के आरोप लगे। लेकिन वही वेबसाइट आज चीन से भारत के पिछड़ जाने की व्याख्या कर देश में अपनाई गई नीतियों की आलोचना कर रही है। (https://swarajyamag.com/business/the-conglomerate-consensus-is-wrong-chinas-champions-didnt-come-from-the-top-of-the-table)

ऐसे बदलावों की कहानियां आज अनगिनत हैं। आर्थिक एवं राजनयिक रूप से भारत के महाशक्ति बनने की ध्वस्त हुई कहानियों से फैली निराशा का दायरा बहुत बड़ा है। कॉकरोच के रूप में इकट्ठा हुआ समूह उन नौजवानों का है, जिनके माता-पिता की पीढ़ी जब मोदी केंद्रित ऊंची उम्मीदों में खोयी हुई थी, उसी समय देश का बुनियादी ताना-बाना बिखर रहा था। इस बिखराव का शिकार शिक्षा व्यवस्था तथा रोजगार की संभावनाएं भी बनी हैं। इसका शिकार वे युवा हुए हैं। इसी बीच शासन तंत्र के ऊंचे मंचों से नीतिगत विफलताओं के शिकार इन युवाओं को कॉकरोच बताया जाने लगा।

निम्न एवं निम्न मध्य वर्ग के नौजवानों के लिए तो पहले भी कोई ऊंची उम्मीद नहीं थी। कॉकरोच जैसे अपमानजनक शब्द उनकी जिंदगी का हमेशा से हिस्सा रहे हैं। लेकिन प्रभु वर्ग से आए नौजवानों के लिए ऐसे अपमान को सहना आसान नहीं है, क्योंकि वे खुद को शासक समूहों का हिस्सा मानते रहे हैं।

भारत में इलीट कौन है, इस बारे में अनेक व्याख्याएं मौजूद हैं। बहरहाल, इस स्तंभकार को डॉ। राम मनोहर लोहिया की व्याख्या हमेशा अधिक माकूल लगी है। डॉ। लोहिया ने कहा था कि भारतीय प्रभु वर्ग का हिस्सा बनने की तीन कसौटियां हैः धन, अंग्रेजी शिक्षा, और सवर्ण जाति। उन्होंने कहा था कि इनमें से कोई दो पहलू साथ हों, तो व्यक्ति/परिवार इलीट का हिस्सा बन जाता है, लेकिन सिर्फ एक पहलू के साथ वह उस सीमित तबके में शामिल नहीं हो सकता। इसे रेखांकित करने की जरूरत है कि कॉकरोच जनता पार्टी की गोलबंदी में अंग्रेजी बोलते और संपन्न पृष्ठभूमि से संबंधित नजर आने वाले नौजवानों की भरमार है।

इन्हीं नौजवानों की प्रतिक्रिया कॉकरोच परिघटना के रूप में सामने आई है। सोशल मीडिया पर यह सशक्त रूप में हमारे सामने है। जमीनी स्तर पर इसका क्या रूप उभरेगा, यह कहना अभी संभव नहीं है। बहरहाल, सोशल मीडिया को कमतर आंकना आज के दौर में एक तरह की नासमझी होगी।

स्पेन में 2014 में उभरे प्रभावशाली जन आंदोलन- पोदेमॉस (Podemos) के पूर्व नेता पॉब्लो इग्लेसियास अब अपने ‘कैनाल रेड टीवी’ (Canal Red TV) नेटवर्क पर La Base (बुनियाद) नामक कार्यक्रम पेश करते हैं। कुछ रोज पहले उन्होंने कहा-

“संघर्ष सड़कों पर है, संसद में नहीं- यह उन कुछ विरोध प्रदर्शनों में गूंजने वाला नारा था, जिनमें मैंने अपनी किशोरावस्था के दौरान हिस्सा लिया। लेकिन यह सच नहीं है। संघर्ष सड़कों पर भी है, संसद में भी, कार्यस्थल पर, विश्वविद्यालय में, अड़ोस-पड़ोस में, ट्रेड यूनियन के भीतर, और उस बार (मयखाने) में भी जहां आप दोस्तों के साथ बियर पीते हैं। संघर्ष चर्च में है, संघर्ष राज्य (सरकार) में है। संघर्ष हमेशा से हर जगह रहा है।

…आज संघर्ष तथा राजनीतिक गतिविधियां डिजिटल सोशल नेटवर्क पर भी मौजूद हैं। अगर हम उस समय का हिसाब लगाएं, जो हर उम्र और हर वर्ग के लोग अपने मोबाइल फोन पर सोशल नेटवर्क देखने में बिताते हैं, तो हम बहुत जल्द इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचेंगे: डिजिटल सोशल नेटवर्क हर उम्र और हर वर्ग के लोगों के लिए सामाजिक मेलजोल (socialization) का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान बन चुका है। इसलिए, राजनीतिक और मीडिया से जुड़ी गतिविधियों को भी वहां होना होगा।”

इग्लेसियास La Base कार्यक्रम में अक्सर सांस्कृतिक संघर्षों और इतालवी मार्क्सवादी विचारक एंतोनियो ग्राम्शी के विचारों की चर्चा करते हैं। अक्सर वे ग्राम्शी का हवाला इस बात का महत्त्व बताने के लिए देते हैं कि जो मीडिया और नैरेटिव (आख्यान) पर नियंत्रण रखता है, वही अंततः राजनीति पर नियंत्रण रखता है। चूंकि अब सोशल मीडिया समाज में संवाद का प्रमुख माध्यम बन गया है, अतः इस पर सक्रिय रहकर वैचारिक युद्ध लड़ना बेहद जरूरी हो गया है।

भाजपा आम सियासी नैरेटिव पर नियंत्रण बनाए रखने में सफल हुई है, तो उसका बड़ा कारण यही है कि प्रभु वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा उसके पक्ष में लामबंद रहा है। इस समूह को अक्सर vocal तबका कहा जाता है- यानी वह वर्ग, जिसके पास जुबान है। जुबान रखने वाले वर्ग का लिबरल हिस्सा तो मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के खिलाफ बना रहा है, मगर वह सिकुड़ती हुई प्रजाति की तरह है। इसलिए खुद से सहमत समूहों से आगे कहीं अपनी आवाज पहुंचाने में वह नाकाम साबित हुआ है।

इसी क्रम में यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अब प्रभु वर्ग के भाजपा समर्थक रहे एक तबके का मोदी राज से मोहभंग होने के संकेत मिल रहे हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे राजनीतिक कथानक पर भाजपा का नियंत्रण कमजोर होगा। खासकर वो निराधार कहानियां अपना असर खोएंगी, जिनके जरिए लोगों के दिमाग में यह बैठाया गया कि भारत विकसित राष्ट्र बनने की राह पर है, देश का तेज गति से आर्थिक विकास हो रहा है, मोदी राज में विदेशों में भारत का दबदबा बना है और मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रभाव बनाने में कामयाब रही है।

इन कहानियों के कारण कई ऐसे तबकों में भी मोदी सरकार को अनिच्छुक मान्यता मिलती रही है, जो समाज को बांटने या अस्थिर करने वाले उसके कदमों से असहज रहे हैं। लेकिन क्या इससे देश में राजनीतिक परिवर्तन का मार्ग भी प्रशस्त होगा?

यह बड़ा सवाल है, और ऐसा नहीं लगता कि अभी इसकी उम्मीद जोड़ने की कोई ठोस वजह है। इसलिए कि संख्या के लिहाज प्रभु वर्ग समाज का छोटा हिस्सा है। भाजपा का समर्थन आधार अब इतना फैल चुका है कि वह उस तरह की अभिजात वर्ग की पार्टी नहीं रह गई है, जैसाकि उसे तब समझा जाता था, जब कई लोग उसे ‘ब्राह्मण- बनिया’ पार्टी कहते थे। अब सूरत यह है कि भाजपा आर्थिक निम्न-वर्ग और सामाजिक तौर पर दलित-पिछड़ी जातियों के बहुत बड़े हिस्से में अपने समर्थन आधार को फैला चुकी है।

प्रभु वर्ग में विभाजन से भाजपा समर्थक कुछ लाउड स्पीकर्स कम जरूर होंगे, लेकिन उससे उसके निम्न वर्गीय समर्थन आधार पर तुरंत शायद ही कोई फर्क पड़ेगा। ये समूह भाजपा के सांप्रदायिक- जातीय ध्रुवीकरण का हिस्सा बने हुए हैँ। कॉकरोच परिघटना की पहुंच उन तबकों तक नहीं है, ना ही जल्द ऐसा होना संभव लगता है। इसकी वजह यह है कि उन लोगों की जिंदगी के यथार्थ अलग हैं। इसीलिए कॉकरोच प्रतिक्रिया का राजनीतिक प्रतिफलन क्या और किस हद तक होगा, इसका अनुमान लगाना फिलहाल कठिन है। फिर भी इसे जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए कि ऐसी प्रतिक्रियाएं अक्सर संबंधित समूहों में गहराई तक हुए राजनीतिक मोहभंग का परिणाम होती हैँ।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक आठ जून को नई दिल्ली में विपक्षी दलों के इंडिया एलायंस की हुई बैठक में ऑनलाइन माध्यम से जुड़े शिव सेना नेता उद्धव ठाकरे ने यह महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया- “कॉकरोच जनता पार्टी जैसी ऑनलाइन परिघटना क्यों जन मानस का ध्यान खींचने में सफल रही, जबकि विपक्ष ऐसा नहीं कर पाया है? क्या इसलिए कि लोगों का हम में भरोसा नहीं रहा?” यह स्थिति की सही समझ से उपजा सवाल है। बाकी विपक्षी नेताओं ने संभवतः इस प्रश्न की अनदेखी की, लेकिन हम इसके जरिए समाज में हो रहे मोहभंग और उसके संभावित परिणामों को समझने की कोशिश जरूर कर सकते हैं।

कुल मिलाकर मुद्दा यही है कि प्रभु वर्ग के एक हिस्से में मोहभंग से उपजी प्रतिक्रिया कितनी धारदार और कितनी व्यापक होगी? जब विपक्षी दल विश्वसनीयता की चुनौती का सामना कर रहे हैं, तो यह सवाल भी अहम हो जाता है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं के व्यक्त होने का माध्यम क्या होगा? इस बारे में शुरुआती कयास लगाने से ज्यादा अभी हम कुछ समझ या कह पाने की स्थिति में नहीं हैं।

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