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‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में किसकी दिलचस्पी!

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक इस महीने होने वाली थी। अप्रैल में लोकसभा के तीन दिन के विशेष सत्र के बाद तय हुआ था कि मई में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद विपक्ष के नेताओं की एक बैठक होगी। इसमें सब एक दूसरे का धन्यवाद कहने वाले थे। तय हुआ था कि जिस तरह की एकता नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के लिए लाए गए बिल पर विपक्ष ने दिखाई थी वैसी ही एकजुटता हमेशा दिखाई जाएगी। इस पर ममता बनर्जी के नेता भी सहमत थे। लेकिन जैसे ही नतीजे आए वैसे ही सबका जोश ठंडा पड़ गया। मई का महीना बीत रहा है और किसी को बैठक की जल्दी नहीं है। इस बीच ममता बनर्जी ने कहा है कि विपक्षी गठबंधन के नेता जून में मीटिंग कर सकते हैं। हालांकि यह एक शुरुआती बयान है। बैठक कहां होगी, कौन कोऑर्डिनेट करेगा और इसका एजेंडा क्या होगा यह अभी तय नहीं है।

असल में अप्रैल के महीने में तृणमूल कांग्रेस के नेता पश्चिम बंगाल की जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे कि वे कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की हर बात मान रहे थे। तभी उन्होंने विपक्षी गठबंधन की मीटिंग पर हामी भर दी थी। उनको लग रहा था बंगाल जीत कर आएंगी ममता बनर्जी तो दिल्ली में उनका भव्य स्वागत होना चाहिए और इससे बड़ा मंच क्या हो सकता है कि विपक्ष के सारे नेता एकजुट हों और वहां ममता की तारीफ हो! जिस तरह से ममता बनर्जी के नेता आश्वस्त थे उसी तरह से एमके स्टालिन के नेता भी तमिलनाडु में जीत के लिए आश्वस्त थे। उनको भी लग रहा था कि वे चुनाव जीत रहे हैं। सारे सर्वेक्षण डीएमके की जीत का अनुमान लगा रहे थे। सो, स्टालिन के लोगों ने भी हामी भर दी और यह तय हो गया था कि मई के महीने में दिल्ली में विपक्षी गठबंधन की बैठक होगी। लेकिन नतीजे पूरी तरह से उलट गए। न सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस हारी, बल्कि स्टालिन की पार्टी भी हार कर सत्ता से बाहर हो गई। बंगाल में भाजपा का जीतना और तमिलनाडु में डीएमके का हारना विपक्ष के लिए बड़ा झटका था।

सो, नतीजों के बाद होने वाली बैठक की फिर चर्चा नहीं हुई। चुनावी हार के कारण इसके पीछे एक वजह यह भी है कि कांग्रेस ने बीच चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ अनापशनाप भाषण दिया। उन्होंने बंगाल जाकर कहा कि ममता की पार्टी ने भाजपा की बंगाल में एंट्री कराई। उन्होंने ममता पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया। उधर तमिलनाडु में चुनाव नतीजे आते ही कांग्रेस ने जिस तरह से डीएमके को छोड़ कर टीवीके को समर्थन दिया वह भी हैरान करने वाला था। कांग्रेस के सिर्फ पांच विधायक जीते हैं लेकिन वह उसी दम पर 60 साल के बाद सरकार में शामिल हो गई है। इसके बाद डीएमके ने लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिख कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था करने को कहा। इस तरह डीएमके और कांग्रेस का संबंध बिगड़ा है तो ममता बनर्जी के साथ भी कांग्रेस के संबंध अच्छे नहीं हैं। कांग्रेस ने अभी केरल में लेफ्ट को रिप्लेस करके अपनी सरकार बनाई है। उधर जब से बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी हारी है तब से झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने विकल्पों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार अब खुल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगे हैं। अगर दोनों एनसीपी एक होते हैं तो उनका एनडीए का साथ रहना तय है। इस तरह गिनी चुनी पार्टियों को छोड़ कर विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां अभी अलग अलग राजनीति कर रही हैं। ऐसे में विपक्षी गठबंधन की कौन नेता या कौन सी पार्टी एकजुटता दिखाने या बैठक करने में दिलचस्पी लेगी? फिर भी ममता बनर्जी ने कहा है कि जून में बैठक होगी तो देखते हैं।

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