मेदिनीनगर (पलामू): गर्मी की दस्तक के साथ ही क्षेत्र के जंगलों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। महुआ चुनने के लालच में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा वनों में लगाई जा रही आग ने अब विकराल रूप ले लिया है। नीलाम्बर-पिताम्बरपुर प्रखंड के कुन्दरी रेंज अंतर्गत आने वाले होटाई, मांहे, डेमा और मनातू के चक जैसे सुदूरवर्ती जंगलों में इन दिनों आग का तांडव देखा जा रहा है।
ग्रामीणों की यह ‘नासमझी’ न केवल हरियाली को निगल रही है, बल्कि वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है।
साफ जमीन के लिए सुलगाई जा रही है ‘मौत की आग’
दरअसल, महुआ के फूल जमीन पर गिरते हैं। सूखे पत्तों के ढेर में इन फूलों को ढूँढना कठिन होता है, इसलिए ग्रामीण आसानी से महुआ इकट्ठा करने के लिए पेड़ों के नीचे सूखे पत्तों में आग लगा देते हैं। सूखे मौसम और तेज हवाओं के कारण यह छोटी सी चिंगारी देखते ही देखते पूरे जंगल को अपनी चपेट में ले लेती है।
जैव विविधता को अपूरणीय क्षति
जंगलों में लगी इस आग से केवल पेड़ ही नहीं जल रहे, बल्कि जमीन पर पनप रहे नन्हे पौधे (Saplings), घास और नई कोंपलें पूरी तरह नष्ट हो रही हैं। स्थानीय निवासी मनोज सिंह और विनय मेहता ने बताया कि आग के कारण जमीन की नमी खत्म हो रही है। वहीं, सतेंद्र और उदेश यादव ने चिंता जताते हुए कहा कि जहरीले धुएं और गर्मी से छोटे जीव-जंतु, पक्षियों के अंडे और सरीसृप दम तोड़ रहे हैं।
विभाग की निष्क्रियता पर उठे सवाल
हैरानी की बात यह है कि वनों को बचाने के लिए जिम्मेदार वन विभाग अब तक मूकदर्शक बना नजर आ रहा है। पूर्व मुखिया केदार यादव और अरविंद सिंह का कहना है कि न तो विभाग द्वारा गश्त बढ़ाई गई है और न ही ग्रामीणों के बीच कोई ठोस जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। प्रभावी कार्रवाई के अभाव में लोगों के हौसले बुलंद हैं।
ग्रामीणों और प्रबुद्ध वर्ग की मांग
क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने प्रशासन और वन विभाग से अविलंब हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
- आग लगाने वाले चिन्हित व्यक्तियों पर वन अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई हो।
- पंचायत स्तर पर बैठकें कर ग्रामीणों को जंगल के महत्व के प्रति जागरूक किया जाए।
- संवेदनशील वन क्षेत्रों में वनकर्मियों की तैनाती और निगरानी बढ़ाई जाए।
यदि समय रहते इन ‘मानव निर्मित’ दावानल (जंगल की आग) पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाले समय में नीलाम्बर-पिताम्बरपुर क्षेत्र की जैव विविधता केवल किताबों तक ही सीमित रह जाएगी। अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि वह इस प्राकृतिक संपदा को बचाने के लिए कितनी सक्रियता दिखाता है।













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