मेदिनीनगर: पलामू प्रमंडल के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और हजारों जिंदगियों को नई राह दिखाने वाले डॉ. विश्वनाथ ओझा अब हमारे बीच नहीं रहे। सोमवार को मेदिनीनगर के जेलहाता स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे शहर में सन्नाटा पसर गया और उनके अंतिम दर्शन के लिए शुभचिंतकों, राजनेताओं और आम जनता का हुजूम उमड़ पड़ा।
चिकित्सा नहीं, सेवा को बनाया धर्म
डॉ. ओझा केवल एक डॉक्टर ही नहीं, बल्कि पलामू वासियों के लिए ‘आशा की अंतिम किरण’ माने जाते थे। उनके बारे में यह विख्यात था कि जब मरीज कहीं से ठीक नहीं होता था, तो वह डॉ. ओझा की शरण में आता था। उनकी सटीक और सरल इलाज पद्धति के कारण लोग उन्हें भगवान का रूप मानते थे। उन्होंने अपने लंबे करियर में न केवल दवाइयों से, बल्कि अपने विनम्र व्यवहार और सांत्वना से भी मरीजों का उपचार किया।
प्रमुख हस्तियों ने दी श्रद्धांजलि
महान चिकित्सक के अवसान पर समाज के विभिन्न वर्गों ने अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त की हैं:
- मेयर अरुणा शंकर: “डॉ. विश्वनाथ ओझा का जाना पलामू के चिकित्सा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने चिकित्सा को कभी व्यवसाय नहीं समझा, बल्कि इसे सेवा का माध्यम बनाया। वे मानवता की प्रतिमूर्ति थे।”
- आनन्द शंकर (अध्यक्ष, चैम्बर ऑफ कॉमर्स): “डॉ. साहब ने समाज के हर वर्ग, विशेषकर गरीबों और जरूरतमंदों की निस्वार्थ सेवा की। कई बार उन्होंने बिना फीस लिए मरीजों का इलाज किया। उनकी कमी हमेशा खलेगी।”
- गौतम सिंह उर्फ डब्लू सिंह (समाजसेवी): डॉ. ओझा के आवास पहुंचकर परिजनों को ढांढस बंधाते हुए उन्होंने कहा, “वे पलामू के चिकित्सा जगत के अभिभावक थे। उनका जाना एक ऐसा शून्य पैदा कर गया है, जिसे भर पाना असंभव है। उनकी सादगी और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेगी।”
विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं पुत्र
डॉ. ओझा की सेवा की इस गौरवशाली विरासत को उनके पुत्र डॉ. निखिल विजय ओझा आगे बढ़ा रहे हैं। डॉ. निखिल भी पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए एक प्रख्यात फिजिशियन और मधुमेह रोग विशेषज्ञ के रूप में क्षेत्र की सेवा कर रहे हैं।
समाज के प्रति समर्पण
डॉ. विश्वनाथ ओझा केवल क्लिनिक तक सीमित नहीं थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से चिकित्सा सुविधाओं को पहुँचाया। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थे। उनके क्लिनिक पर उमड़ने वाली भीड़ उनके प्रति लोगों के अटूट विश्वास का प्रमाण थी।
डॉ. विश्वनाथ ओझा का निधन पलामू के एक अध्याय का अंत है। भले ही वे भौतिक रूप से विदा हो गए हों, लेकिन उनके द्वारा बचाई गई हजारों जानें और उनका मानवीय दृष्टिकोण पलामू के इतिहास में सदैव अमर रहेगा। पूरा क्षेत्र आज अपने इस ‘मसीहा’ को अश्रुपूरित नेत्रों से नमन कर रहा है।













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