राँची: राजधानी के जुमार नदी तट पर आज एक बार फिर मानवता और संवेदनशीलता की ऐसी तस्वीर देखने को मिली, जिसने समाज के सामने निस्वार्थ सेवा का एक बड़ा उदाहरण पेश किया है। शहर की सामाजिक संस्था ‘मुक्ति’ द्वारा रिम्स मोर्चरी में लंबे समय से रखे 24 अज्ञात शवों का पूरे विधि-विधान और धार्मिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
सम्मान के साथ अंतिम यात्रा
संस्था के सदस्यों ने सुबह रिम्स (RIMS) स्थित मोर्चरी गृह पहुँचकर इन अज्ञात शवों को ससम्मान बाहर निकाला। प्रत्येक शव को विधिवत पैक किया गया और उन्हें जुमार नदी के तट पर ले जाया गया। जहाँ दुनिया ने इन शवों को ‘अज्ञात’ कहकर छोड़ दिया था, वहीं मुक्ति संस्था के सदस्यों ने परिजनों की तरह उनकी अंतिम यात्रा की व्यवस्था की।
सर्वधर्म सद्भाव का संगम
मुक्ति संस्था का यह कार्य सामाजिक समरसता की भी अनूठी मिसाल है। दाह संस्कार के दौरान संस्था के अध्यक्ष प्रवीण लोहिया ने सभी शवों को मुखाग्नि दी। वहीं, मृत आत्माओं की शांति के लिए परमजीत सिंह टिंकू द्वारा अंतिम अरदास की गई। संस्था का मानना है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका अंतिम संस्कार धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करना पूरी मानवता की जिम्मेदारी है।
2153 का आँकड़ा: सेवा का अटूट संकल्प
अंतिम संस्कार के पश्चात मीडिया से बात करते हुए अध्यक्ष प्रवीण लोहिया ने बताया कि:
”मुक्ति संस्था अब तक कुल 2153 अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी है। आज के दौर में जब लोग अपने परिचितों के लिए भी आगे आने से कतराते हैं, ऐसे में इन लावारिस शवों को सम्मान देना हमारा नैतिक कर्तव्य है। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी इंसान का अंत लाचारी में न हो।”
उपस्थित रहे समाज के सजग प्रहरी
इस पुनीत कार्य में संस्था के दर्जनों सदस्यों ने कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया। मौके पर मुख्य रूप से उपस्थित रहे राहुल जायसवाल, रवि अग्रवाल, संजय गोयल, विजय धानुका, सौरभ बथवाल, पंकज खिरवाल, निर्मल मोदी, सुमित अग्रवाल, वीरेंद्र गुप्ता, आदित्य शर्मा, आशीष भाटिया, गौरीशंकर शर्मा, राहुल चौधरी, अरुण कुतरियार, संजय सिंह, नवीन मित्तल, उज्जवल जैन, राजा गोयनका, अमित अग्रवाल, गोपाल गाड़ोदिया, हरीश नागपाल एवं आर के गांधी।
राँची में ‘मुक्ति’ संस्था का यह निरंतर अभियान न केवल मृत आत्माओं को गरिमा प्रदान कर रहा है, बल्कि जीवित समाज को यह संदेश भी दे रहा है कि संवेदनशीलता ही मनुष्यता का असली आधार है। जुमार नदी के तट पर जलती ये चिताएँ उन 24 जिंदगियों के आखिरी सम्मान की गवाह बनीं, जिनका इस दुनिया में कोई अपना नहीं था।













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