वाराणसी : दुनिया जहाँ रंगों के त्योहार होली की तैयारी में सराबोर है, वहीं मोक्ष की नगरी काशी एक ऐसे उत्सव की प्रतीक्षा कर रही है जो सामान्य मानवीय कल्पना से परे है। आगामी 28 फरवरी को मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर वह दृश्य जीवंत होगा, जिसे ‘मसान होली’ कहा जाता है। यहाँ अबीर-गुलाल नहीं, बल्कि जलती चिताओं की भस्म हवा में उड़ाई जाएगी, जो जीवन की नश्वरता और शिव के अघोर स्वरूप का मिलन कराएगी।
शिव और अघोर गणों का अनूठा मिलन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन मास की ‘रंगभरी एकादशी’ पर जब महादेव माता पार्वती का गौना कराकर काशी लौटे, तो उन्होंने देवताओं के साथ गुलाल की होली खेली। लेकिन श्मशान निवासी भूत, प्रेत, पिशाच और अघोरी भक्त इस आनंद से वंचित रह गए। अपने इन अनन्य भक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, शिव ने अगले दिन महाश्मशान पर उनके साथ भस्म की होली खेली। तभी से यह परंपरा अटूट चली आ रही है।
मृत्यु के साये में जीवन का उल्लास
मसान होली का नजारा जितना डरावना लग सकता है, उतना ही यह आध्यात्मिक शांति से भरा होता है। एक ओर जहाँ मणिकर्णिका घाट पर चिताएं जल रही होती हैं, वहीं दूसरी ओर डमरू की गूँज और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों के बीच भक्त भस्म की बौछार करते हैं।
“यह उत्सव और विरक्ति का अद्भुत संगम है। यहाँ जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर धुंधली पड़ जाती है। हम सिखाते हैं कि अंततः सब कुछ इसी राख में मिल जाना है।”
— स्थानीय अघोरी साधु
2026 का कार्यक्रम: कब और कहाँ?
इस वर्ष रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को मनाई जाएगी, जिसके ठीक अगले दिन यानी 28 फरवरी को मसान होली का आयोजन होगा।
- मणिकर्णिका घाट: यहाँ महाश्मशान नाथ मंदिर में विशेष पूजा और आरती के बाद दोपहर से उत्सव की शुरुआत होगी।
- हरिश्चंद्र घाट: यहाँ भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखे दृश्य के साक्षी बनेंगे।
पर्यटन नहीं, जीवन का साक्षात्कार
काशी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव है। जिला प्रशासन और स्थानीय तीर्थ पुरोहितों ने आगंतुकों से श्मशान की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि मसान होली अहंकार और मोह के त्याग का संदेश देती है।














Leave a Reply