मेदिनीनगर (पलामू): देश अपनी आजादी के 75वें साल का जश्न मनाकर ‘अमृत महोत्सव’ में प्रवेश कर चुका है, लेकिन पलामू जिले का ऐतिहासिक और सुप्रसिद्ध ‘तरहसी साप्ताहिक हाट बाजार’ आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। आजादी के पहले से लग रहे इस बाजार की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय व्यापारी भी जुटते हैं। विडंबना यह है कि दशकों बीत जाने के बाद भी यहाँ न तो व्यापारियों के लिए शेड की व्यवस्था है और न ही जल-निकासी का कोई ठोस इंतजाम।
तीन राज्यों का व्यापारिक संगम, फिर भी उपेक्षित
तरहसी का यह हाट बाजार पलामू प्रमंडल के सबसे बड़े पशु और कृषि बाजारों में से एक माना जाता है। यहाँ प्रत्येक सप्ताह झारखंड के चतरा, लोहरदगा, गढ़वा और लातेहार जिलों के अलावा पड़ोसी राज्य बिहार के गया एवं औरंगाबाद और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले से भारी संख्या में पशु व्यापारी और किसान पहुँचते हैं। करोड़ों का टर्नओवर होने के बावजूद प्रशासन की उदासीनता के कारण यह बाजार विकास की बाट जोह रहा है।
प्रमुख समस्याएँ: व्यापारियों और किसानों की जुबानी
स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आए व्यापारियों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि बुनियादी सुविधाओं का अभाव अब उनके व्यापार पर असर डाल रहा है:
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- शेड का अभाव: कड़कड़ाती धूप हो या मूसलाधार बारिश, व्यापारियों को खुले आसमान के नीचे बैठने को मजबूर होना पड़ता है। पशुओं के लिए भी कोई छायादार स्थान नहीं है।
- जलभराव और गंदगी: जल निकासी की व्यवस्था न होने के कारण बारिश के दिनों में पूरा बाजार कीचड़ के टापू में तब्दील हो जाता है, जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता है।
- पेयजल और शौचालय की कमी: दूर-दराज से आने वाले व्यापारियों के लिए शुद्ध पेयजल और समुचित शौचालय की व्यवस्था न होना ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के दावों पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
- सुरक्षा और विश्राम गृह: दूसरे राज्यों से आने वाले व्यापारी अक्सर रात में ही यहाँ पहुँच जाते हैं, लेकिन उनके ठहरने के लिए कोई सरकारी विश्राम गृह या सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।
”तरहसी हाट से सरकार को हर साल राजस्व मिलता है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर यहाँ शून्य है। हम अपनी जान जोखिम में डालकर और कीचड़ में बैठकर व्यापार करने को मजबूर हैं।”
— पीड़ित व्यापारी
राजस्व का स्रोत, पर विकास का अकाल
पलामू के विभिन्न प्रखंडों की लाइफलाइन कहे जाने वाले इस हाट से स्थानीय प्रशासन को अच्छी-खासी आय होती है। इसके बावजूद, विकास योजनाओं की फाइलों में यह बाजार कहीं गुम है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे तो किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही तरहसी हाट की बदहाली को नियति मानकर छोड़ दिया जाता है।
निष्कर्ष:
यदि समय रहते तरहसी साप्ताहिक हाट की बुनियादी सुविधाओं में सुधार नहीं किया गया, तो अंतरराज्यीय व्यापारियों का मोह इस ऐतिहासिक बाजार से भंग हो सकता है, जिसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन ‘अमृत काल’ के इस दौर में तरहसी की इस विरासत को संवारता है या इसे बदहाली के अंधेरे में ही रहने देता है।













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