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आधी आबादी का पूरा नेतृत्व: पलामू में शक्ति का नया स्वरूप, अहम कुर्सियों पर काबिज हैं महिलाएं

मेदिनीनगर : झारखंड का पलामू जिला इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पूरे देश के लिए महिला सशक्तिकरण की एक बेमिसाल प्रयोगशाला बनकर उभरा है। जिले के प्रशासनिक ढांचे से लेकर जनप्रतिनिधियों के शिखर तक, आज पलामू की कमान ‘नारी शक्ति’ के हाथों में है। यह राज्य के इतिहास में संभवतः पहला ऐसा मौका है, जब कमिश्नर से लेकर मेयर तक के पदों पर महिलाएं बैठकर न केवल नीतियां बना रही हैं, बल्कि उन्हें धरातल पर उतार भी रही हैं।

​प्रशासनिक मोर्चे पर ‘विमेंस पावर’

​जिले के प्रशासनिक गलियारे आज महिलाओं की कार्यकुशलता से जीवंत हैं। प्रमंडल के सर्वोच्च पद कमिश्नर की जिम्मेदारी कुमुद सहाय संभाल रही हैं, जिनके पास विकास और नियोजन का लंबा अनुभव है। वहीं, जिले की मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी उपायुक्त (DC) के रूप में समीरा एस. अपनी प्रशासनिक पैठ के लिए जानी जा रही हैं।

​कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षक (SP) रीश्मा रमेशन के कंधों पर है। उनके नेतृत्व में जिला पुलिस अपराध नियंत्रण और सामुदायिक पुलिसिंग में नए आयाम स्थापित कर रही है। अनुमंडल स्तर पर भी एसडीओ सुलोचना मीणा अपनी सक्रियता से जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान कर रही हैं।

​जनप्रतिनिधि के रूप में नेतृत्व की कमान

​प्रशासन के साथ-साथ राजनीति और स्थानीय स्वशासन में भी महिलाएं आगे हैं। जिला परिषद अध्यक्ष प्रतिमा कुमारी ग्रामीण क्षेत्रों के विकास का खाका तैयार कर रही हैं, तो पलामू के सबसे बड़े शहरी केंद्र मेदिनीनगर नगर निगम की मेयर अरुणा शंकर शहर के आधुनिकीकरण का नेतृत्व कर रही हैं।

​विभागीय नेतृत्व और सामाजिक प्रभाव

​जिले की रसद और कल्याणकारी योजनाओं की बागडोर भी महिलाओं के सुरक्षित हाथों में है:

  • ​प्रीति किस्कू: जिला आपूर्ति पदाधिकारी के रूप में राशन वितरण प्रणाली को पारदर्शी बना रही हैं।
  • ​नीता चौहान: जिला समाज कल्याण पदाधिकारी के तौर पर महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए समर्पित हैं।

​पलामू का संदेश: भागीदारी से आगे बढ़कर नेतृत्व तक

​समाजशास्त्रियों का मानना है कि पलामू की यह तस्वीर केवल पदों के नाम नहीं, बल्कि एक ‘साइलेंट रिवोल्यूशन’ (मौन क्रांति) है। जब एक बच्ची अपने जिले की डीसी या एसपी को एक महिला के रूप में देखती है, तो उसके सपनों को पंख मिलते हैं। यह नेतृत्व न केवल शासन को अधिक संवेदनशील बना रहा है, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच पर एक कड़ा प्रहार भी है।

​”पलामू का यह उदाहरण दर्शाता है कि जब महिलाओं को अवसर मिलते हैं, तो वे केवल सहभागिता नहीं करतीं, बल्कि व्यवस्था का सफल संचालन और नेतृत्व भी करती हैं।”

— प्रशासनिक विशेषज्ञ

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