Advertisement

अमेरिका की रहम और मौन

भारत को आज अमेरिका से असामान्य ‘अनुमति’ मिली! अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा— अमेरिकी ट्रेज़री विभाग (वित्त मंत्रालय) ने भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति देते हुए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है। इससे ठीक दो दिन पहले भारत से लौट रहे एक ईरानी नौसैनिक पोत को (जो भारत के न्यौते पर, भारत की मेजबानी में शांति-कालीन प्रैक्टिस में भाग लेकर लौट रहा था) अमेरिकी पनडुब्बी ने हमला कर डुबोया। पर भारत ने प्रतिक्रिया ऐसे दी है मानो कुछ हुआ ही नहीं। विदेश मंत्रालय की ओर से अमेरिका के आगे स्पष्ट कूटनीतिक विरोध दर्ज नहीं हुआ, न ही कोई तीखा वक्तव्य आया। प्रधानमंत्री भी मौन रहे।

बयान, दृश्य, खामोशी सामने है। यों अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मौन भी एक संकेत होता है। पर ईरान के घटनाचक्र और भारत की लाचारगी का मौन अब वैश्विक राजनीति में असलियत का भौकाल है। जो देश स्वयं को लगातार विश्वगुरु के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। नगाड़ों के साथ कूटनीति करता हुआ है, वह अब प्रक्षेपित छवि और वास्तविकता के बीच में विश्व को कैसा दिखलाई दे रहा होगा, इसका अनुमान लगा सकते हैं। भारत का राजनीतिक, कूटनैतिक कथानक अगल-बगल की कठोर भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के आगे पस्त है। तभी संकट की विकटता में अमेरिका की अनुमति, छूट, रहम पर भारत खुशी मना रहा है। देश के भीतर इस घटनाक्रम को भारत के महत्व के प्रमाण के रूप में इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो वाशिंगटन दिल्ली के आगे झुक गया हो।

सच्चाई जगजाहिर हो रही है। पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति धीरे-धीरे एक मंचित प्रदर्शन में बदली है। कूटनीति एक दृश्य, एक तमाशे की तरह अपनाई गई। गले लगने, हाथ मिलाने के क्षण, सावधानी से सजाए गए फ़ोटोग्राफ़, भव्य प्रवासी रैलियाँ—हर दृश्य इस तरह रचा गया मानो एक ऐसे नेता की छवि गढ़नी हो जो विश्व के ध्यान के केंद्र में खड़ा है। यह फोटोजनित राजनीति, कूटनीति देश-विदेश के आगे इमेज का गुब्बारा बना रही थी। पाँच वर्ष पहले जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था, तब भारत के भीतर सबसे प्रभावशाली छवि युद्ध की जटिलता नहीं, बल्कि वहाँ से छात्रों के निकासी के वीडियो और फोटो थे। टेलीविज़न स्क्रीन भारतीय ध्वज में लिपटे छात्रों की वापसी के दृश्यों से भरे थे। सोशल मीडिया पर आत्मविश्वास से दावा था कि रूसी मिसाइलें भी उस तिरंगे के सम्मान में ठहर गईं—मानो नरेंद्र मोदी ने तिरंगे को इतना शक्तिशाली बना दिया हो जो युद्ध क्षेत्र भी उसके सम्मान में ठहर जाता है।

लेकिन फोटो, तस्वीरें प्रभावशाली हो सकते हैं, सत्य और शक्ति नहीं। जी-20 या एआई शिखर सम्मेलन की मेज़बानी निस्संदेह दिल्ली की झूमरों के नीचे वैश्विक नेताओं की आकर्षक तस्वीरें बनाती है। लेकिन तस्वीरें अपने आप विदेश नीति का रौब, भू-राजनीतिक हिसाब नहीं बदलतीं। विशेषकर तब, जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने वाले संकट कहीं और घटित हो रहे हों और भारत की आवाज़ तुरंत अजीब मौन के बिल में दुबकती है!

एक दशक से भारत की विदेश नीति अक्सर तमाशे और मौन के बीच झूलती दिखाई दी है।

रिकॉर्ड पर नज़र डालें। जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, तो भारत ने संयुक्त राष्ट्र में सावधानी से संतुलित तटस्थता का रास्ता चुना। मॉस्को की निंदा करने वाले प्रस्तावों पर बार-बार मतदान से परहेज़ किया। इस स्थिति को “रणनीतिक स्वायत्तता” कहा गया। मतलब रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम के साथ बढ़ती साझेदारियों के बीच संतुलन का प्रयास। पश्चिम एशिया में भी इसी तरह की अस्पष्टता दिखाई दी, जब इज़राइल ने गाज़ा पर लगातार बमबारी शुरू की। हाल के वर्षों में भारत ने इज़राइल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को गहरा किया था—रक्षा सहयोग बढ़ाया, कूटनीतिक गर्मजोशी खुलकर दिखाई। लेकिन जैसे ही गाज़ा विनाश की ओर बढ़ा, नई दिल्ली की भाषा अचानक सावधानीपूर्ण हो गई। बयान संतुलित रहे—संयम की अपील, मानवीय सहायता की बात—लेकिन वह नैतिक दम था ही नहीं जिसे कई अन्य लोकतांत्रिक देशों ने व्यक्त किया था।

यह असंगति घर के अधिक मुखर दिखाई दी।

पहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की घोषणा काफी कड़े शब्दों के साथ की, इसे पाकिस्तान के विरुद्ध दृढ़ संकल्प के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। घरेलू कथा तेजी से जोशीली, उग्र हुई। टेलीविज़न स्टूडियो जंग के मैदान में बदले। सोशल मीडिया पर घोषणा होने लगी कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का क्षण आ गया है। लेकिन जल्द ही उस क्षण की हवा निकल गई जब डोनाल्ड ट्रंप के बयान, टैरिफ धमकियां, संवाद सुनाई दिए। मतलब दृश्य स्क्रीन पर विजयी ढंग से फैले और रणनीतिक परिणाम फुस्स।

इसका अर्थ यह नहीं कि भारत के पास शक्ति की संभावनाएँ नहीं हैं। बिल्कुल हैं। 78 वर्ष का गणराज्य एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, विशाल बाज़ार है और क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण ताकत है। दुनिया के देश भारत को इसलिए महत्व देते हैं क्योंकि वह मायने रखता है। लेकिन महत्व दिया जाना और प्रभावशाली होना एक ही बात नहीं है। बाज़ार के रूप में मूल्यवान होना और रणनीतिक आवाज़ के रूप में सम्मानित होना—इन दोनों के बीच बड़ा फर्क होता है।

और यही फर्क अब दिखाई देने लगा है।

विश्वगुरु की हमारी भाषा लगातार ऊँची होती गई है, जबकि भारत की कूटनीतिक भाव-भंगिमा गिरगिटी, सतर्क, मौन तथा दुबकने की है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा में इसे “हेजिंग” कहा जाता है—जब बड़ी शक्तियाँ टकरा रही हों तो स्पष्ट प्रतिबद्धता से बचने की सावधानी। लेकिन विडंबना स्पष्ट है। एक ऐसा देश जो सभ्यतागत नेतृत्व की बात करता है और स्वयं को ग्लोबल साउथ की आवाज़ बताता है, वही अक्सर इतना चौकन्ना रहता है कि कहीं कोई शक्तिशाली नाराज़ न हो जाए।

जो देश बार-बार बाहरी दबावों के आगे झुकता दिखता है, वह उभरती शक्ति से अधिक उस देश की तरह दिखने लगता है जो दूसरों द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर काम करना सीख रहा हो। वाशिंगटन से आई हालिया छूट इसी पदानुक्रम की याद दिलाती है—कि इक्कीसवीं सदी में भी भारत ऐसी व्यवस्था के भीतर है जिसे वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं करता। विरोधाभास और भी तीखा है: एक नेतृत्व जो अक्सर 56 इंच की छाती, दृढ़ संकल्प और सभ्यतागत आत्मविश्वास की भाषा बोलता है, वही कई बार उन दबावों को स्वीकार करता दिखता है जिन्हें कभी भाषणों में चुनौती देने का दावा किया गया था।

और यही हमें फिर असहज सवाल की ओर ले आता है: क्या यह सत्य नहीं कि भारत के उदय की कहानी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई थी? या फिर उसकी शक्ति की कहानी असल में वास्तविक शक्ति से कहीं तेज़ गति से दुनिया में फैली? मौजूदा क्षण संकेत दे रहा है कि भारत की शक्ति की भाषणबाजी शायद स्वयं शक्ति से कहीं आगे निकल चुकी है।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright 2026. All right reserved. Loktantra TV News Website Design by E- MEDIA Web & App - 7999906109
error: Content is protected !!