चेन्नई : भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की कानूनी मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। मद्रास हाईकोर्ट ने एक दशक पुराने मानहानि मामले में धोनी को 10 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि तुरंत जमा करने का निर्देश दिया है। यह आदेश पूर्व आईपीएल सट्टेबाजी घोटाले से जुड़ी विवादित सीडी के ट्रांसक्रिप्शन (लेखन) और अनुवाद के खर्च को कवर करने के लिए दिया गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई साल 2014 में शुरू हुई थी जब धोनी ने रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी जी. संपत कुमार के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया था। धोनी का आरोप है कि संपत कुमार ने उन्हें 2013 के आईपीएल सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग घोटाले से जोड़कर उनकी छवि खराब करने की कोशिश की थी।
कोर्ट ने क्यों लगाया ₹10 लाख का शुल्क?
जस्टिस आर.एन. मंजुला की पीठ ने 11 फरवरी को इस मामले पर अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट के अनुसार, मामले के साक्ष्य के रूप में पेश की गई सीडी के कंटेंट को रिकॉर्ड पर लाने के लिए उसका अनुवाद और ट्रांसक्रिप्शन अनिवार्य है।
- विशाल कार्यभार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीडी में मौजूद सामग्री इतनी अधिक है कि एक इंटरप्रेटर और एक टाइपिस्ट को इसे पूरा करने में 3 से 4 महीने का समय लगेगा।
- विशेष परिस्थिति: जज ने कहा कि आमतौर पर वादी (धोनी) को खुद ये दस्तावेज तैयार करवाकर देने होते हैं, लेकिन मामले की संवेदनशीलता और विशेष परिस्थितियों के कारण कोर्ट के आधिकारिक इंटरप्रेटर को यह जिम्मेदारी दी गई है।
- अतिरिक्त खर्च: इसी अतिरिक्त समय और संसाधनों की भरपाई के लिए कोर्ट ने 10 लाख रुपये का खर्च तय किया है, जिसे वादी होने के नाते धोनी को ही वहन करना होगा।
समय सीमा और अगली सुनवाई
कोर्ट ने सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि धोनी को यह राशि 12 मार्च 2026 तक मद्रास हाईकोर्ट चीफ जस्टिस रिलीफ फंड में जमा करानी होगी।
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- डेडलाइन: इंटरप्रेटर को मार्च 2026 के तीसरे सप्ताह तक अपना काम पूरा करने का निर्देश दिया गया है।
- सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई भी 12 मार्च 2026 को तय की गई है, जहाँ कोर्ट राशि जमा होने की पुष्टि करेगा।
”यह कार्य इतना व्यापक है कि इसके लिए अदालती मशीनरी का काफी समय खर्च होगा। इसलिए, इसका वित्तीय भार वादी को ही उठाना होगा।” — जस्टिस आर.एन. मंजुला













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