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लोकतंत्र अपने उजाले में ही मर रहा है!

पिछले हफ्ते वॉशिंगटन पोस्ट में हुई छँटनी चौंकाने वाली नहीं थी। एक कॉरपोरेट फ़ैसले के तहत तीन सौ से ज़्यादा पत्रकार और कर्मचारी निकाल दिए गए। इसे व्यापारिक मजबूरी कहा गया। मतलब संस्था की “बदलती ज़रूरतों” के मुताबिक की गई छंटनी। स्थानीय, अंतरराष्ट्रीय, सांस्कृतिक और फ़ोटो जैसे पूरे रिपोर्टिंग विभाग या तो खत्म कर दिए गए या बेहद छोटे कर दिए गए। सोचिए, यूक्रेन युद्ध कवर कर रहीं एक पत्रकार ने लिखा, “मैं युद्ध क्षेत्र में हूँ और मुझे निकाल दिया गया है।” दिल्ली में तैनात अख़बार के पत्रकारों की भी छुट्टी हुई।

कहा जाता है कि लोकतंत्र अँधेरे में मरता है। लेकिन क्या नहीं लग रहा कि वह उजाले की झगमगाती चकाचौंध में भी दम तोड़ सकता है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जो न तो खुलकर अलोकतांत्रिक है, न औपचारिक रूप से तानाशाही। यही इस दौर की सबसे ख़तरनाक विडंबना है। लोकतंत्र पर कोई सैनिक चढ़ाई नहीं हो रही। संविधान रद्द नहीं किए जा रहे। चुनाव टाले नहीं जा रहे। लोकतंत्र बाहर से नहीं गिराया जा रहा। वह संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर ही धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है।

अब यह बात चेतावनी माफिक नहीं है। यह रोज़मर्रा का अनुभव है। दरअसल लोकतंत्र न अचानक गिरता है, न किसी एक झटके में खत्म होता है। वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है—प्रशासनिक फ़ैसलों में, प्रबंधकीय भाषा में, और उन “अनिवार्यताओं” में, जिनके नाम पर संस्थाएँ अपने बुनियादी उसूल छोड़ती चली जाती हैं।

इसलिए लोकतंत्र को बाहर से मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह भीतर ही भीतर, पूरी रोशनी में, सबकी आँखों के सामने दम तोड़ता है। इसे समझने के लिए संविधान की मोटी किताबें पलटने या अदालतों की कार्यवाहियों में उलझने की ज़रूरत नहीं। बस मीडिया को देख लीजिए। लोकतंत्र कैसे कमजोर होता है—धीरे-धीरे, संगठनात्मक ढंग से, और कहानी गढ़ने के तरीक़ों के ज़रिये—इसका सबसे साफ़ उदाहरण आज मीडिया ही है।

यह लोकतांत्रिक क्षरण किसी अचानक टूट-फूट का नतीजा नहीं है। यह रोज़मर्रा के फ़ैसलों, प्रबंधकीय प्राथमिकताओं और ‘व्यावहारिक मजबूरियों’ के नाम पर किए गए समझौतों का जोड़ है। मीडिया बोलता ज़रूर है, लेकिन उसी दायरे में जिसे उसने अपने लिए सुरक्षित मानना सीख लिया है। और यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र शोर में नहीं, बल्कि सामान्यता में मरता है।

अमीर लोकतंत्र में वॉशिंगटन पोस्ट जैसी संस्था का इस तरह कमजोर होना सचमुच एक बड़ा झटका था। इसलिए नहीं कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, बल्कि इसलिए कि यह सब लोकतांत्रिक मानकों के ख़िलाफ़ नहीं हुआ। यह ठीक उन्हीं नए नियमों के मुताबिक हुआ, जिन्हें लोकतांत्रिक जनादेश से सत्ता में बैठे लोग अब तय कर रहे हैं।

यह गिरावट किसी आपातकालीन फ़रमान या खुले दमन का नतीजा नहीं है। यह एक “वैध” फ़ैसला था—कॉरपोरेट भाषा में लिया गया, दक्षता और अनिवार्यता के नाम पर। और यही इस दौर की सबसे बेचैन करने वाली सच्चाई है। लोकतंत्र आज टूट नहीं रहा। वह नियमों के भीतर रहकर ख़ुद को खोखला कर रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अब उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ संयम दिखाने की ज़रूरत ही नहीं समझी जाती। विश्वविद्यालय हों या अदालतें, क़ानूनी फ़र्में हों या नियामक संस्थाएँ—हर जगह दबाव बढ़ाने की एक सुनियोजित प्रक्रिया दिखती है। यह दमन खुले बल से नहीं होता। यह अनुपालन, थकान और असुरक्षा के ज़रिये चलता है। लेकिन ट्रंप के लिए सत्ता को “महान” बनाने की एक शर्त साफ़ जाहिर है और वह है मीडिया को झुकाना। ऐसा प्रेस जो सत्ता को असहज न करे, हर नीति पर सवाल न उठाए, और ज़िंदा रहने के लिए अपनी आवाज़ को तौल-तौल कर इस्तेमाल करे। पर ऐसा होना पत्रकारिता नहीं रह जाती। वह तो सत्ता का चारण इतिहास लिखना है, चापलूसी करना है। उससे पूछताछ नहीं करना है।

पर इस प्रवृति में अब अमेरिका हमें न चौंकाता है और न असह्य लगता है।

और ऐसा भारत में भी रोजमर्रा का अनुभव है। प्रक्रिया और भी चुपचाप, लेकिन उतनी ही गहराई से चल रही है। मीडिया संस्थान एक झटके में बंद नहीं किए गए। उन्हें खरीदा गया। संपादकों को जेल नहीं भेजा गया। उन्हें बदला गया, मोड़ा गया, या बिना शोर के हाशिए पर सरका दिया गया। नियंत्रण की भाषा वैचारिक नहीं रही। वह प्रबंधकीय हो गई—दक्षता, टिकाऊपन, ‘एलाइनमेंट’। प्रेस अब भी बोलता है, लेकिन लगातार सिकुड़ती उन सीमाओं के भीतर, जिन्हें उसने परखना कब का छोड़ दिया है।

जब ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ की छँटनी की ख़बर आई, तो भारत के नए मीडिया इकोसिस्टम की प्रतिक्रिया ने इस सच को और उजागर किया। कुछ जगहों पर इसे त्रासदी नहीं, तमाशे की तरह लिया गया। कहा गया कि एक “लिबरल” अमेरिकी अख़बार को उसकी औक़ात दिखा दी गई। यह प्रतिक्रिया पोस्ट से ज़्यादा हमारे यहाँ की पत्रकारिता की हालत बताती है। क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट में जो खोया है, उसे समझने के लिए पत्रकारिता को एक प्रोफेशन की तरह समझना होगा। मैदान में जाकर रिपोर्टिंग करना, जांच-पड़ताल करना, संस्थागत स्मृति को जिंदा रखना, और सत्ता से सवाल करने की ज़िद रखना। भारत में यह समझ धीरे-धीरे लगभग पूरी तरह घिस चुकी है।

आज रिपोर्टिंग ज़मीन से नहीं, स्टूडियो और दफ़्तरों से होती है। ख़बरें आधिकारिक ब्रीफ़िंग्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स से बनती हैं। सत्ता के हाशियों से सच निकालने की मेहनत कम होती जा रही है। कैमरे चल रहे हैं, आवाज़ें ऊँची हैं, लेकिन सवाल कम होते जा रहे हैं।

यह सिर्फ़ भारत की कहानी नहीं है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ संस्था के मुताबिक, दुनिया भर में मीडिया की आज़ादी पीछे हट रही है। आधे से ज़्यादा देशों में पत्रकारिता की हालत ‘कठिन’ या ‘बहुत गंभीर’ हो चुकी है। यों लोकतंत्र आज भी बोलते हैं, लेकिन वे उन लोगों की कम सुनते हैं जो असहज सवाल पूछते हैं।

यहीं भारत और अमेरिका—दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र—एक-दूसरे के आईना बन गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोनों ने यह समझ लिया है कि लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए तख़्तापलट की ज़रूरत नहीं। उसे धीरे-धीरे, खुलेआम और जनसमर्थन के साथ खोखला किया जा सकता है। पत्रकारिता को आर्थिक रूप से असुरक्षित और सार्वजनिक रूप से संदिग्ध बनाकर।

कभी अमेरिका में ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ के ज़रिये वॉटरगेट कांड उजागर हुआ था। कभी भारत ने आपातकाल के समय भी, इंदिरा गांधी की निरंशुकता के दौर में अखबार के खाली पेज से, छोटी पत्र-पत्रिकाओं से सत्तावाद के खिलाफ सुहबुगाहट बनाई थी। तब लोकतंत्र अँधेरे में मर रहा था पर लोक चेतना सुलगी हुई थी।

आज वह सब उजाले में मर रहा है। और तय माने इतिहास हमसे यह नहीं नहीं पूछेगा कि हमें क्या पता नहीं था। वह हमसे पूछेगा—इस तरह दम तोड़ते हुए क्यों देखा?

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