नई दिल्ली : संसद के मौजूदा सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच ठनी रार खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पिछले चार दिनों से लोकसभा की कार्यवाही पूरी तरह ठप है, जिसे लेकर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र के मंदिर में विपक्ष की आवाज को जानबूझकर कुचला जा रहा है।
‘नेता विपक्ष को बोलने नहीं दिया जा रहा’
संवाददाताओं से चर्चा करते हुए खरगे ने नाराजगी जाहिर की कि सदन में विपक्षी नेताओं, खासकर नेता प्रतिपक्ष को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया जा रहा। उन्होंने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले चार दिनों से लोकसभा नहीं चल पा रही है। जब भी विपक्ष जनता से जुड़े मुद्दे उठाना चाहता है या अपनी बात रखना चाहता है, तो उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। सरकार चर्चा से भाग रही है।”
संसद के स्वरूप पर खरगे की टिप्पणी
संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लेख करते हुए खरगे ने सरकार को याद दिलाया कि संसद किसी एक सदन या सिर्फ सत्तापक्ष से नहीं चलती। उन्होंने जोर देकर कहा:
”लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही संसद के अटूट स्तंभ हैं। इन दोनों सदनों के मिलने से ही पार्लियामेंट का निर्माण होता है। यदि एक भी स्तंभ में विपक्ष की आवाज को अनसुना किया जाएगा, तो संसदीय लोकतंत्र का ढांचा कमजोर होगा।”
गतिरोध के मुख्य बिंदु
सदन में जारी हंगामे के पीछे कई प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं, जिन्होंने सरकार और विपक्ष के बीच की खाई को चौड़ा कर दिया है:
- विपक्ष की मांग: विपक्ष किसी विशेष मुद्दे (जैसे जेपीसी जांच या महंगाई) पर विस्तृत चर्चा और प्रधानमंत्री के जवाब पर अड़ा है।
- सत्तापक्ष का रुख: सरकार का कहना है कि विपक्ष सदन की कार्यवाही में जानबूझकर बाधा डाल रहा है और महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को रोक रहा है।
- कार्यवाही स्थगित: हंगामे के चलते पिछले 96 घंटों में लोकसभा में एक भी विधायी कार्य सुचारू रूप से संपन्न नहीं हो सका है।
लोकतंत्र पर गहराता संकट?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि संसद के दोनों सदनों में इसी तरह का गतिरोध बना रहा, तो इसका सीधा असर जनता के मुद्दों और लंबित बिलों पर पड़ेगा। खरगे के कड़े तेवरों से साफ है कि आने वाले दिनों में भी सदन में शांति के आसार कम ही हैं। विपक्ष अब इस लड़ाई को सदन से सड़क तक ले जाने की रणनीति बना रहा है।
सरकार का पक्ष : जानिए
पक्ष-विपक्ष का टकराव: तर्क और इतिहास के आईने में
संसद में जारी वर्तमान गतिरोध को समझने के लिए सत्तापक्ष के तर्कों और पिछले कुछ वर्षों के संसदीय आंकड़ों पर नज़र डालना ज़रूरी है।
सरकार का पक्ष: ‘विपक्ष की नकारात्मक राजनीति’
सरकार ने विपक्ष और विशेषकर मल्लिकार्जुन खरगे के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। सत्तापक्ष के प्रवक्ताओं और मंत्रियों का तर्क है कि:
- चर्चा से भागने का आरोप: सरकार का कहना है कि वे हर मुद्दे पर नियमों के तहत चर्चा के लिए तैयार हैं, लेकिन विपक्ष ‘नियमों की जिद’ पकड़कर सदन को बंधक बना रहा है।
- करदाताओं के पैसे का नुकसान: संसदीय कार्य मंत्री के अनुसार, संसद की कार्यवाही रुकने से हर मिनट लाखों रुपये का सार्वजनिक धन बर्बाद होता है, जिसकी ज़िम्मेदारी विपक्ष की है।
- विपक्ष की हताशा: सरकार का दावा है कि चुनावों में हार के कारण विपक्ष हताश है और संवैधानिक संस्थाओं की छवि खराब करने के लिए हंगामा कर रहा है।
तुलनात्मक विश्लेषण: ऐतिहासिक गतिरोध
संसद में काम ठप होना कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ बड़े गतिरोधों पर एक नज़र:
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शीतकालीन सत्र (2010) |
2G स्पेक्ट्रम घोटाला |
पूरा सत्र ठप रहा। विपक्ष JPC की मांग पर अड़ा था। यह इतिहास के सबसे कम कामकाज वाले सत्रों में से एक था। |
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मानसून सत्र (2021) |
पेगासस और कृषि कानून |
भारी हंगामा हुआ। लोकसभा की उत्पादकता मात्र 21% और राज्यसभा की 28% रही थी। |
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बजट सत्र (2023) |
अडानी मुद्दा और राहुल गांधी का बयान |
संसदीय उत्पादकता पर प्रभाव
आंकड़ों के अनुसार, जब भी संसद में गतिरोध होता है, तो सबसे अधिक नुकसान ‘प्रश्नकाल’ (Question Hour) का होता है, जहाँ सांसद सीधे मंत्रियों से जवाब मांग सकते हैं।
विशेष नोट: विधायी विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले एक दशक में “हंगामा करके सदन स्थगित कराना” एक रणनीतिक हथियार बन गया है, जिससे सदन की गरिमा और प्रभावशीलता कम हुई है।
Arvind Sinha –













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