अगस्त 2020 में जब लद्दाख की सीमा के रेज़िन ला पर चीनी बख़्तरबंद दस्ते हिमालयी सीमा पर भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे थे तो वह बेहद नाज़ुक क्षण था। सेनाध्यक्ष नरवणे ने राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट दिशा माँगी। पर उन्हे उत्तर मिला—“जो आपको ठीक लगे, वही करें”—वह मार्गदर्शन नहीं था। यह ज़िम्मेदारी से बचने का तरीका था। यह नेतृत्व का ज़िम्मेदारी से पल्ला छोड़ना था।…महान राष्ट्र अपने जनरलों की प्रतिभा से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक निर्णयों की स्पष्टता से पहचाने जाते हैं।
सतीश झा
जब पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा सार्वजनिक चर्चा में आई, तो विवाद होना स्वाभाविक था। कुछ लोगों ने इसे असावधानी कहा, कुछ ने इसे ईमानदारी का उदाहरण माना। राजनीतिक पक्षधरता तुरंत प्रतिक्रिया में बदल गई। लेकिन इस शोर के नीचे एक ज्यादा गंभीर सवाल छिपा था। यह सवाल किसी एक जनरल का नहीं था, बल्कि उस स्थिति का था जब अनिश्चितता पूरी हो, समय कम हो और राजनीतिक नेतृत्व मौन साध ले।
कई लोगों को यह प्रसंग क्यूबा मिसाइल संकट की याद दिलाता है, जिसे केवल शीत युद्ध की घटना नहीं, बल्कि अत्यधिक अनिश्चित परिस्थितियों में निर्णय लेने का उदाहरण माना जाता है। कुछ को इसमें कोरिया में डगलस मैकआर्थर और अफगानिस्तान में स्टैनली मैकक्रिस्टल की स्थिति दिखती है, जहां सेनापति युद्ध की ज़रूरतों और राजनीतिक हिचक के बीच फँसे रहे। लेकिन नरवणे का अनुभव इनसे अलग है। यहां राजनीतिक असमंजस धीरे-धीरे रणनीति बन गया और कमांडर को अकेले नैतिक निर्णय लेने पड़े।
नेतृत्व कभी भी पूरी स्पष्टता में काम नहीं करता। कारोबारी दुनिया में फैसले अस्थिर बाज़ार और अधूरी जानकारी के बीच लिए जाते हैं। सेना में स्थिति और कठिन होती है। खुफिया सूचनाएँ अधूरी होती हैं, दुश्मन की मंशा स्पष्ट नहीं होती, इलाका कठिन होता है और समय का दबाव लगातार बना रहता है। फर्क अनिश्चितता का नहीं, परिणामों का होता है। एक गलत व्यावसायिक फैसला कंपनी को नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन एक गलत सैन्य फैसला सीमाएँ बदल सकता है और हज़ारों जानें ले सकता है।
अगस्त 2020 में यह स्थिति रेज़िन ला पर सामने आई, जब चीनी बख़्तरबंद दस्ते हिमालयी सीमा पर भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे थे। यह बेहद नाज़ुक क्षण था। तोपख़ाने का एक आदेश बड़े टकराव को जन्म दे सकता था। नरवणे ने राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट दिशा माँगी। उन्होंने सैन्य सलाह नहीं चाही, बल्कि यह जानना चाहा कि अंतिम ज़िम्मेदारी कौन लेगा।
उन्हें जो उत्तर मिला—“जो आपको ठीक लगे, वही करें”—वह मार्गदर्शन नहीं था। यह ज़िम्मेदारी से बचने का तरीका था। नेतृत्व में काम सौंपना अलग बात है और ज़िम्मेदारी छोड़ देना अलग। काम सौंपने में जवाबदेही बनी रहती है, जबकि ज़िम्मेदारी छोड़ने में वह मौन में गुम हो जाती है।
क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने निर्णय लेने की एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई थी। अलग-अलग राय सुनी गईं, असहमति को जगह मिली और अंत में निर्णय की ज़िम्मेदारी उन्होंने खुद ली। इसके उलट भारत की स्थिति में स्पष्टता नहीं दिखी। राजनीतिक नेतृत्व पीछे हट गया, ठीक उसी समय जब उसे आगे होना चाहिए था।
इस मौन ने नरवणे की भूमिका बदल दी। वह केवल सैन्य कमांडर नहीं रहे, बल्कि ऐसे व्यक्ति बन गए जिन्हें राजनीतिक असर वाले फैसले लेने पड़े। उन्हें सिर्फ़ सैनिक तैनाती ही नहीं, बल्कि यह भी सोचना पड़ा कि तनाव बढ़ा तो अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया क्या होगी, देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा और जान-माल का नुकसान कितना होगा। एक सैनिक को देश के संयम का बोझ उठाना पड़ा।
उन्होंने जो रास्ता चुना—बिना गोली चलाए आमने-सामने तैनाती कर चीनी बढ़त को रोकना—वह तत्काल रूप से सफल रहा। युद्ध टल गया। लेकिन इस तरह का संयम, अगर संस्थागत रूप से समर्थित न हो, तो सेना और शासन व्यवस्था दोनों को नुकसान पहुँचाता है। इससे सैन्य नेतृत्व को राजनीतिक वैधता के बिना राजनीतिक फैसले लेने पड़ते हैं।
इतिहास में ऐसे उदाहरण पहले भी रहे हैं। कोरिया युद्ध में मैकआर्थर को लगा कि राजनीतिक हिचक से हार तय है, जबकि राष्ट्रपति ट्रूमैन परमाणु युद्ध से बचना चाहते थे। टकराव का अंत टकराव में हुआ। अफगानिस्तान में मैकक्रिस्टल को जीत की माँग तो की गई, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सीमाएँ तय कर दी गईं। रणनीति धीरे-धीरे सिर्फ़ हालात झेलने तक सिमट गई।
नरवणे का मामला इसलिए अलग है क्योंकि यहाँ खुला विरोध या संघर्ष नहीं था, बल्कि राजनीतिक मौन था। यह सबसे खतरनाक स्थिति होती है। इसमें ज़िम्मेदारी नीचे डाल दी जाती है, जबकि ऊपर इनकार की गुंजाइश बनी रहती है। जनरल को राजनीतिक फैसले लेने पड़ते हैं, लेकिन राजनीतिक अधिकार के बिना।
आज की राजनीति में एक और समस्या उभर रही है—कथा प्रबंधन। मीडिया के लगातार दबाव में निर्णय से ज़्यादा उसकी छवि अहम हो जाती है। अस्पष्टता को कूटनीति नहीं, बल्कि घरेलू संदेश के लिए इस्तेमाल किया जाने लगता है। मौन को संयम कहा जाता है। लेकिन सीमाओं पर बयान नहीं, ठोस निर्णय काम आते हैं। नक्शे भाषणों से नहीं बदलते और पहाड़ प्रेस नोट से पीछे नहीं हटते।
स्पष्ट आदेश न देकर राजनीतिक नेतृत्व ने खुद को सुरक्षित रखा। अगर युद्ध होता तो ज़िम्मेदारी नीचे जाती, और अगर शांति रहती तो उसे बाद में समझदारी कहा जा सकता था। इस तरह जोखिम का बोझ असमान रूप से सैनिकों पर पड़ा, जबकि राजनीतिक नेतृत्व के पास विकल्प खुले रहे।
इससे नागरिक और सैन्य संस्थाओं के बीच भरोसा कमजोर होता है। अल्पकाल में कमांडर अकेले पड़ जाते हैं। दीर्घकाल में रणनीतिक सोच कमजोर होती है। अगर यह चलन बन जाए, तो राष्ट्रीय सुरक्षा व्यक्तियों के स्वभाव पर निर्भर हो जाती है, न कि संस्थाओं पर।
महान राष्ट्र अपने जनरलों की प्रतिभा से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक निर्णयों की स्पष्टता से पहचाने जाते हैं। क्यूबा मिसाइल संकट इसलिए याद किया जाता है क्योंकि वहाँ एक ऐसी व्यवस्था थी जो अनिश्चितता को संभाल सकी और जिम्मेदारी तय कर सकी।
भारत की चुनौती सैन्य क्षमता की नहीं है। चुनौती है रणनीतिक ज़िम्मेदारी की। नरवणे की किताब किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाती, बल्कि व्यवस्था की कमजोरियों को सामने लाती है। यह याद दिलाती है कि कई बार सबसे बड़ी विफलता सावधानी के रूप में सामने आती है। हिचक को संयम और मौन को समझदारी कहा जाने लगता है।
लेकिन संकट के क्षणों में सबसे खराब फैसला न तो युद्ध होता है, न ही संयम। सबसे खराब फैसला होता है कोई फैसला न लेना। नेतृत्व का अर्थ परिणामों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी लेना है। नरवणे ने संयम चुना और वह बोझ अकेले उठाया, जिसे संस्थाओं को साझा करना चाहिए था। इतिहास उनके तत्काल निर्णय को सही मान सकता है, लेकिन उसे उस मौन को ज़रूर कठघरे में खड़ा करना चाहिए, जिसने इस अकेलेपन को ज़रूरी बना दिया।
क्योंकि युद्ध में भी और शासन में भी, मौन कभी तटस्थ नहीं होता। वह केवल ज़िम्मेदारी को टालता है—और टली हुई ज़िम्मेदारी जब लौटती है, तो भारी कीमत के साथ लौटती है।













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